US-Iran Conflict: अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर हमला किया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इसके परिणाम इतने गंभीर होंगे। हालात अब इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पूरी दुनिया पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग की आग में झुलस रही है। ईरान के साथ टकराव ने सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर असर डाल दिया है, जिसका सबसे बड़ा असर अब ऊर्जा आपूर्ति पर देखने को मिल रहा है।
वहीं इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना मैसेंजर बनाया है, जिसकी मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच हालात सामान्य करने की कोशिशें की जा रही हैं। (US-Iran Conflict) लेकिन कथित तौर पर सबसे पहले इस्लामिक बम की अवधारणा देने वाले पाकिस्तान को अपना संदेशवाहक बनाने के बाद अब ट्रंप को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
US-Iran Conflict: ब्रह्मा चेलानी ने उठाए अमेरिका पर सवाल
यहां रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिका की नीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए अमेरिका और पाकिस्तान के बीच चल रही कूटनीतिक रणनीति को विस्तार से समझाया है।
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चेलानी ने लिखा कि अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति में एक विरोधाभासी स्थिति देखने को मिल रही है। (US-Iran Conflict) पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो ईरान पर दबाव बनाने के लिए लंबे समय से आक्रामक रुख अपनाते रहे हैं, अब उसी मकसद को पूरा करने के लिए पाकिस्तान की मदद लेने को मजबूर नजर आ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि करीब 40 दिनों तक चले हवाई हमलों और दबाव के बावजूद अमेरिका, ईरान को उसके शुरुआती परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के लिए राजी नहीं कर सका। ऐसे में अब ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को तेहरान के साथ संवाद का माध्यम बनाने की रणनीति अपनाई है।
इस्लामिक बम और पाकिस्तान का विवादित इतिहास
दरअसल ब्रह्मा चेलानी ने अपने विश्लेषण में पाकिस्तान के परमाणु इतिहास की भी चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि 1970 के दशक में ‘इस्लामिक बम’ की अवधारणा सबसे पहले पाकिस्तान ने ही दी थी और बाद में उसने गुप्त रूप से अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। (US-Iran Conflict) इस कार्यक्रम को तेल संपन्न देशों जैसे सऊदी अरब और लीबिया से वित्तीय समर्थन मिलने की बात भी सामने आई थी, जिससे यह मुद्दा और विवादास्पद बन गया।
ए क्यू खान नेटवर्क से बढ़ी वैश्विक चिंता
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 2000 के दशक की शुरुआत में अब्दुल कदीर खान के नेतृत्व में चल रहे अंतरराष्ट्रीय परमाणु तस्करी नेटवर्क का खुलासा हुआ। (US-Iran Conflict) इस नेटवर्क ने कई देशों को संवेदनशील परमाणु तकनीक उपलब्ध कराई, जिससे पश्चिमी देशों की चिंताएं काफी बढ़ गई थीं। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान को वैश्विक दबाव का सामना करना पड़ा और उसे ‘इस्लामिक बम’ जैसी अवधारणाओं से दूरी बनानी पड़ी।
अमेरिका की रणनीति पर उठे बड़े सवाल
वहीं अब ऐसा माना जा रहा है कि इन सभी तथ्यों को देखते हुए ऐसे देश को मध्यस्थ बनाना, जिसका खुद का परमाणु अतीत विवादों से घिरा रहा हो, अमेरिका की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। (US-Iran Conflict) यह कदम न केवल कूटनीतिक चुनौती को दर्शाता है बल्कि अमेरिका की नीति के दोहरेपन और उसकी सीमाओं को भी उजागर करता है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय संतुलन और वैश्विक परमाणु सुरक्षा पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
