Pakistan Economic Crisis: आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं। पहले से कर्ज के भारी बोझ और महंगाई की मार झेल रहे देश पर अब ईरान से जुड़े युद्ध के असर ने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया है कि इस संघर्ष ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
बुधवार को जारी एक बयान में शहबाज शरीफ ने कहा कि पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान ने आर्थिक सुधार की दिशा में जो भी प्रगति की थी, वह युद्ध के कारण लगभग खत्म हो गई है। (Pakistan Economic Crisis) उन्होंने बताया कि तेल की कीमतों में भारी उछाल ने देश की कमर तोड़ दी है। उनके मुताबिक, पहले पाकिस्तान हर सप्ताह लगभग 30 करोड़ अमेरिकी डॉलर तेल आयात पर खर्च करता था, लेकिन अब यह खर्च बढ़कर 80 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। इस अप्रत्याशित वृद्धि ने पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर और दबाव डाल दिया है।
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शहबाज शरीफ के इस बयान से यह भी साफ हो गया कि पाकिस्तान इस संघर्ष में मध्यस्थता करने के लिए इतना सक्रिय क्यों था। दरअसल, वह किसी भी तरह हालात सामान्य करना चाहता था ताकि आर्थिक दबाव कम हो सके। (Pakistan Economic Crisis) हालांकि, उसकी यह कोशिश सफल नहीं हो सकी, क्योंकि संघर्ष में शामिल पक्ष बातचीत के अगले दौर के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान अब भी तनाव कम कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।
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इस बीच, देश में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के पास कच्चे तेल का भंडार बेहद सीमित रह गया है और केवल 5 से 7 दिनों की जरूरत पूरी करने लायक ही स्टॉक बचा है। इस स्थिति ने आम लोगों की परेशानियां बढ़ा दी हैं और कई जगहों पर हालात लगभग लॉकडाउन जैसे बन गए हैं। (Pakistan Economic Crisis) सरकार ने तेल की खपत कम करने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। लोगों को घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) करने की सलाह दी गई है, वहीं सरकारी खर्चों में कटौती के तहत अधिकारियों और मंत्रियों के वेतन में भी कमी की गई है। बावजूद इसके, हालात में सुधार के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे हैं। युद्ध के असर ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को और गंभीर बना दिया है, जिससे उबरना अब उसके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
