THAAD AIR Defense: अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी से ईरान पर हमले शुरू किए, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। दरअसल, इन हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन दाग दिए थे। इसके बाद इन हमलों ने सिर्फ वहां नुकसान ही नहीं पहुंचाया, बल्कि अमेरिका के अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे दिया। फिलहाल सैटेलाइट तस्वीरों ने इस सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है।
THAAD AIR Defense: THAAD और पैट्रियट सिस्टम पर उठे सवाल
दरअसल ईरान के हमलों के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर हो रही है। खासतौर पर लॉकहीड मार्टिन का टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस यानी THAAD सिस्टम, जिसे अब तक बेहद सटीक और भरोसेमंद माना जाता था। इसके साथ पैट्रियट PAC-3 बैटरियां भी तैनात थीं, जिनका काम कम दूरी के खतरों और ड्रोन से निपटना था।
Also Read -Udhampur Bus Accident: उधमपुर बस हादसा: राष्ट्रपति मुर्मु, PM मोदी ने जताया दुख, 2-2 लाख मुआवजा
अमेरिका ने इन सिस्टम्स को खाड़ी देशों को एक मजबूत सुरक्षा कवच के तौर पर पेश किया था, लेकिन ईरान के हमलों ने इस दावे को चुनौती दे दी है।
- Advertisement -
गोल्ड स्टैंडर्ड से छेद वाली छतरी तक
असल में अमेरिका ने इन सिस्टम्स को खाड़ी देशों को ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ यानी सबसे बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था बताकर बेचा था। दावा किया गया था कि ये सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइलों को उनके आखिरी चरण में ही खत्म कर देंगे। खाड़ी देशों ने भी इस भरोसे पर अरबों डॉलर खर्च किए।
लेकिन 28 फरवरी से 8 अप्रैल के बीच चले इस संघर्ष में तस्वीर कुछ और ही नजर आई। यहां सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर जैसे देशों में ईरान की मिसाइलों ने इसे चकमा देते हुए सटीक निशाने साधे। इसके बाद कई विशेषज्ञ इन सिस्टम्स को ‘छेद वाली छतरी’ तक कहने लगे हैं।
Also Read –Deepika Padukone Film Raaka: क्या प्रेग्नेंसी के चलते Deepika Padukone के हाथ से निकल जाएगी Raaka?
सऊदी-अमेरिका डील पर भी उठे सवाल
गौरतलब हो कि पिछले साल मई में सऊदी अरब और अमेरिका के बीच 142 अरब डॉलर का बड़ा सैन्य समझौता हुआ था। इस पैकेज में THAAD सिस्टम, पैट्रियट PAC-3 अपग्रेड, आधुनिक मिसाइलें, ड्रोन और भारी मात्रा में गोला-बारूद शामिल था।
लेकिन हालिया हमलों के बाद इस समझौते पर भी सवाल उठने लगे हैं। जब इन सिस्टम्स की असली परीक्षा हुई, तो वे ईरानी हमलों के सामने कमजोर साबित हुए। यहां तक कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी मिसाइलें गिरती हुई देखी गईं।
सैटेलाइट तस्वीरों ने दिखाई जमीनी हकीकत
वहीं सैटेलाइट तस्वीरों से यह भी सामने आया कि जॉर्डन, सऊदी अरब और यूएई में THAAD सिस्टम के अहम AN/TPY-2 रडार को सीधे निशाना बनाया गया। इन रडार को इस सिस्टम की ‘आंखें’ कहा जाता है।
सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर बने रडार शेल्टर पूरी तरह तबाह हो गए। जॉर्डन का मुवफ़्फक साल्टी एयर बेस भी हमले की चपेट में आया। वहीं यूएई में अल रुवैस के पास THAAD बैटरी के ढांचे पर भी सीधा हमला हुआ।
पैट्रियट सिस्टम भी नहीं दे पाया पूरी सुरक्षा
वहीं पैट्रियट सिस्टम को भी ईरान के हमलों के सामने काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बड़ी संख्या में आए ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों ने इसे ओवरवेल्म कर दिया। सस्ते लेकिन बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए गए ईरानी ड्रोन और मिसाइलों ने यह दिखा दिया कि ये सिस्टम बड़े पैमाने के हमलों के सामने सीमित हो जाते हैं।
खाड़ी देशों के सामने अब बड़ा सवाल
वहीं अब इन घटनाओं के बाद खाड़ी देशों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उन्होंने सही जगह निवेश किया। जिन सिस्टम्स को अभेद्य सुरक्षा कवच बताया गया था, वही अब कमजोर नजर आ रहे हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि ईरान के हमलों ने खाड़ी देशों को यह सच्चाई दिखा दी है कि सिर्फ महंगे हथियार खरीदना ही सुरक्षा की गारंटी नहीं होता। अब इन देशों में अमेरिकी सैन्य उपकरणों पर निर्भरता को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है।
कुल मिलाकर, इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि रणनीति और हमलों की तीव्रता भी बहुत बड़ा रोल निभाती है। ईरान के हमलों ने अमेरिका की उस ‘अभेद्य ढाल’ की छवि को झटका दिया है, जिस पर खाड़ी देशों ने अब तक आंख मूंदकर भरोसा किया था।
