Iran-US War: ईरान और अमेरिका के बीच अचानक हुये को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब एक ऐसा सनसनीखेज दावा किया है, जिसने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरान को घुटनों पर लाने और बातचीत की मेज तक खींचने के पीछे कोई और नहीं, बल्कि ड्रैगन यानी चीन का हाथ है। यह खबर इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि अब तक चीन खुद को इस मामले से दूर दिखा रहा था, लेकिन ट्रंप की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पर्दे के पीछे चल रहे इस बड़े ‘गेम’ को बेनकाब कर दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने खास प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक ऐसी बात लिख दी जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने दावा किया कि उन्हें पूरा “विश्वास” है कि अगर चीन पहल नहीं करता, तो यह सीजफायर कभी मुमकिन ही नहीं होता। ट्रंप के इस खुलासे ने पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की मध्यस्थता वाली खबरों को पीछे छोड़ दिया है। (Iran-US War) अब यह साफ हो गया है कि पर्दे के पीछे चीन ने अपनी कूटनीति के ऐसे मोहरे चले कि ईरान को पीछे हटना पड़ा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि चीन की इस अदृश्य भूमिका ने युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया को फिलहाल एक बड़ी तबाही से बचा लिया है, लेकिन इसके पीछे चीन का अपना क्या स्वार्थ है, यह अभी भी एक रहस्य बना हुआ है।
Iran-US War: चीन की जादुई बैकडोर डिप्लोमेसी का सच
रिपोर्ट्स की मानें तो चीन ने इस बार सीधे तौर पर सामने आने के बजाय एक बहुत ही शातिर रास्ता अपनाया। उसने पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देशों को अपना मोहरा बनाया और उनके जरिए ईरान तक कड़े संदेश पहुंचाए। (Iran-US War) चीन लगातार ईरान को यह समझाने में जुटा था कि अगर यह युद्ध और बढ़ा, तो न सिर्फ खाड़ी देश बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। दिलचस्प बात यह है कि चीन ने आधिकारिक तौर पर इस भूमिका को कभी स्वीकार नहीं किया। (Iran-US War) जब चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही नपे-तुले शब्दों में सिर्फ इतना कहा कि सभी देशों को “ईमानदारी” दिखानी चाहिए। चीन खुद को एक शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा था, जबकि असल में वह पर्दे के पीछे से पूरी बिसात बिछा रहा था।
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होर्मुज स्ट्रेट पर चीन और रूस की बड़ी चाल
सीजफायर से ठीक पहले चीन का असली चेहरा तब दिखा जब उसने रूस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका के प्रस्ताव को वीटो कर दिया। अमेरिका चाहता था कि होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय फौज तैनात हो, लेकिन चीन ने इसे सीधे तौर पर ठुकरा दिया। (Iran-US War) अमेरिका ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन और रूस ने “गिरावट की सारी हदें” पार कर दी हैं और वे ईरान का साथ दे रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह चीन की दोहरी रणनीति थी। एक तरफ वह अमेरिका को चुनौती दे रहा था और दूसरी तरफ ईरान को अहसास दिला रहा था कि मुसीबत में सिर्फ चीन ही उसका साथ दे सकता है।
क्या पाकिस्तान सिर्फ एक चेहरा बनकर रह गया?
इस पूरे ड्रामे में पाकिस्तान ने भी जमकर सुर्खियां बटोरीं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने दावा किया कि उन्होंने ट्रंप से बात करके ईरान पर होने वाले हमले को रुकवाया। (Iran-US War) ट्रंप ने भी माना कि पाकिस्तान के अनुरोध और इस शर्त पर कि ईरान ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को तुरंत खोल देगा, वे दो हफ्तों के लिए हमले टालने को तैयार हुए हैं। लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान वाकई इतना ताकतवर मध्यस्थ है या फिर असली मास्टरमाइंड चीन ही था जिसने पाकिस्तान को सिर्फ एक ‘चेहरे’ के तौर पर इस्तेमाल किया? फिलहाल इस सीजफायर ने दुनिया को राहत तो दी है, लेकिन यह शांति कितनी लंबी चलेगी, यह चीन की अगली चाल पर निर्भर करेगा।
