Iran US Israel War: मध्य पूर्व के रेतीले मैदानों से उठती बारूद की गंध अब पूरी दुनिया की राजनीति में खलबली मचा रही है। एक तरफ आसमान से बरसती मिसाइलें हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों के गलियारों में छिड़ी एक ऐसी कानूनी जंग, जिसने महाशक्ति अमेरिका की नींव हिला दी है। आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ा और कड़ा सवाल यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध अपराधी घोषित किया जा सकता है?
यह बहस महज किताबी नहीं रह गई है। जब तेहरान की सड़कों पर मासूम बच्चों की चीखें सुनाई देती हैं और सदियों पुरानी सभ्यता के प्रतीक कहे जाने वाले पुल मलबे में तब्दील हो जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कानून के पन्ने पलटे जाने लगते हैं। (Iran US Israel War) अमेरिका, जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक कहता है, आज उसी के कमांडर-इन-चीफ पर ‘वॉर क्राइम्स’ के गंभीर आरोप लग रहे हैं। विशेषज्ञों का एक धड़ा मानता है कि ट्रंप ने युद्ध की मर्यादाओं को लांघ दिया है, जबकि दूसरा धड़ा इसे कूटनीति का हिस्सा बता रहा है। लेकिन क्या वास्तव में ट्रंप को पिंजरे में खड़ा किया जा सकता है? आइए, इस भीषण तनाव के पीछे छिपी खौफनाक सच्चाई को विस्तार से समझते हैं।
Iran US Israel War: खौफनाक धमकियां: पाषाण युग में भेजने का ऐलान
युद्ध केवल हथियारों से नहीं, शब्दों से भी लड़ा जाता है, लेकिन जब शब्द पूरी सभ्यता को मिटाने की बात करने लगें, तो वे सबूत बन जाते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप और उनके युद्ध सचिव पीट हेगसेथ की हालिया बयानबाजी ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया है। (Iran US Israel War) ट्रंप ने जिस लहजे में ईरान को पाषाण युग में वापस भेजने की धमकी दी है, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के नेता के लिए असामान्य है।
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पीट हेगसेथ ने तो यहां तक कह दिया कि वे ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला करेंगे। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह भाषा केवल सैन्य ठिकानों को तबाह करने की नहीं है, बल्कि यह एक पूरे राष्ट्र के अस्तित्व और वहां के नागरिकों के जीवन जीने के संसाधनों को खत्म करने की मंशा को दर्शाती है। (Iran US Israel War) जब कोई नेता सार्वजनिक मंच से कहता है कि “आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी,” तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून की नजर में ‘अपराधी इरादे’ का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है।
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शिक्षा के मंदिर पर हमला
ईरान के तेहरान में स्थित शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी कोई साधारण कॉलेज नहीं है। (Iran US Israel War) इसे ईरान का ‘MIT’ कहा जाता है। 1966 में स्थापित यह संस्थान दुनिया के टॉप 100 सिविल इंजीनियरिंग संस्थानों में शुमार है। लेकिन एक काली रात अमेरिकी बमों ने इस ज्ञान के मंदिर को खंडहर बना दिया।
विश्लेषकों का कहना है कि शरीफ यूनिवर्सिटी न केवल विज्ञान का केंद्र थी, बल्कि वह छात्रों के लोकतांत्रिक आंदोलनों का भी गढ़ रही है। इस पर हमला करना किसी भी सैन्य रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता। (Iran US Israel War) आखिर एक यूनिवर्सिटी से किस तरह का सैन्य खतरा हो सकता था? ईरानी-अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला केवल डराने और ईरान की भविष्य की पीढ़ी को पंगु बनाने के लिए किया गया है, जो सीधे तौर पर युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है।
मीनाब स्कूल का नरसंहार
इस युद्ध की सबसे हृदयविदारक घटना मीनाब में एक लड़कियों के स्कूल पर हुआ हमला है। इस हमले में लगभग 170 मासूम बच्चों की मौत हो गई, जिनकी उम्र महज 7 से 12 साल के बीच थी। (Iran US Israel War) अमेरिका ने इसे ‘इंटेलिजेंस फेलियर’ करार दिया और कहा कि वे पास में स्थित IRGC (ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स) के ठिकाने को निशाना बना रहे थे।
लेकिन कानून के जानकार इस दलील को खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि अगर आपने टारगेट की पुष्टि नहीं की थी, तो यह ‘लापरवाही’ नहीं बल्कि ‘युद्ध अपराध’ है। अंतरराष्ट्रीय कानून कहता है कि किसी भी हमले से पहले यह सुनिश्चित करना हमलावर सेना की जिम्मेदारी है कि वहां नागरिक मौजूद न हों। 170 लड़कियों की मौत ने वाशिंगटन के उन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है जिसमें वह सटीक हमलों की बात करता है।
बुनियादी ढांचे पर प्रहार कर जनता का गला घोंटने की कोशिश
तेहरान को करज शहर से जोड़ने वाले पुल और ईरान के प्रमुख पावर ग्रिड्स (बिजली संयंत्र) पर लगातार हमले हो रहे हैं। इन पुलों का उपयोग आम जनता दफ्तर जाने और रसद पहुँचाने के लिए करती है। बिजली संयंत्रों पर हमले का मतलब है अस्पतालों में वेंटिलेटर का बंद होना और आम घरों में अंधेरा छा जाना।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन बुनियादी ढांचों का कोई तत्काल सैन्य महत्व नहीं है। जब ट्रंप इन ठिकानों पर हमले की धमकी देते हैं, तो इसे ‘सामूहिक सजा’ (Collective Punishment) माना जाता है। जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार, किसी सरकार पर दबाव बनाने के लिए वहां की आम जनता के पानी, बिजली और परिवहन को रोकना गैर-कानूनी है। यह युद्ध की रणनीति नहीं, बल्कि आतंकवाद का एक रूप माना जा सकता है।
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं, जिन्हें ‘लॉज ऑफ वार’ कहा जाता है। (Iran US Israel War) जिनेवा कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के रोम कानून के तहत, नागरिक संपत्तियों को जानबूझकर निशाना बनाना अपराध है। कानून दो मुख्य कसौटियों पर काम करता है:
- क्या उस लक्ष्य का कोई वास्तविक सैन्य उपयोग हो रहा था?
- क्या उस हमले से होने वाला सैन्य लाभ, नागरिकों को होने वाले नुकसान की तुलना में अधिक था?
यदि इन दोनों सवालों के जवाब असंतोषजनक हैं, तो हमला करने वाला कमांडर और उसे आदेश देने वाला राष्ट्राध्यक्ष दोनों ही अपराधी माने जाते हैं। ट्रंप के मामले में, उनके खुद के बयान ही उनके खिलाफ सबसे बड़े गवाह बनते जा रहे हैं।
जब नेताओं को जाना पड़ा जेल
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े नेता पर युद्ध अपराध के आरोप लगे हों। (Iran US Israel War) इतिहास गवाह है कि सत्ता की कुर्सी हमेशा के लिए ढाल नहीं बन सकती।
- स्लोबोदान मिलोसेविच: सर्बिया के इस पूर्व नेता पर बाल्कन युद्धों के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया था।
- चार्ल्स टेलर: लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति को एक अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने दोषी ठहराया और सजा दी।
- बेंजामिन नेतन्याहू: 2024 में गाजा युद्ध को लेकर ICC ने इजरायली प्रधानमंत्री के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट की मांग की थी।
इन उदाहरणों से साफ है कि दुनिया अब बदल रही है। कोई भी नेता, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। हालांकि, ट्रंप का मामला थोड़ा अलग और पेचीदा है।
ट्रंप के खिलाफ मुकदमे में सबसे बड़ी बाधा
कानूनी रूप से भले ही ट्रंप के खिलाफ पर्याप्त सबूत दिख रहे हों, लेकिन उन्हें अदालत तक लाना पहाड़ हिलाने जैसा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का सदस्य नहीं है। अमेरिका ने हमेशा से अपने नागरिकों और सैनिकों को अंतरराष्ट्रीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने के लिए हर संभव कोशिश की है।
ट्रंप पर मुकदमा चलाने के लिए या तो अमेरिका के अंदर ही राजनीतिक सत्ता पलटनी होगी या फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के जरिए कोई विशेष ट्रिब्यूनल बनाना होगा। (Iran US Israel War) लेकिन अमेरिका के पास ‘वीटो’ पावर है, जिसका इस्तेमाल वह अपने राष्ट्रपति को बचाने के लिए करेगा। इसलिए, फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रंप की गिरफ्तारी की संभावना बहुत कम नजर आती है।
क्या देश के अंदर फंसेंगे राष्ट्रपति ट्रंप?
भले ही अंतरराष्ट्रीय अदालतें लाचार हों, लेकिन अमेरिका का अपना ‘युद्ध अपराध अधिनियम’ बेहद सख्त है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून के तहत उन अपराधों के लिए कोई समय सीमा नहीं होती जिनमें किसी की जान गई हो।
इसका मतलब यह है कि भले ही आज ट्रंप सत्ता में हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही, लेकिन भविष्य में जब सरकार बदलेगी या सालों बाद कोई नई जांच शुरू होगी, तो उन्हें अमेरिकी अदालतों में जवाबदेह ठहराया जा सकता है। कानून के जानकार गैबोर रोना का मानना है कि आज नहीं तो कल, जवाबदेही की बारी जरूर आएगी।
क्यों नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा है अमेरिका?
ईरान के प्रति ट्रंप प्रशासन की बढ़ती आक्रामकता के पीछे एक गहरी हताशा छिपी है। ट्रंप ने जिस ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने का वादा किया था, वह अभी भी तेहरान में मजबूती से डटा हुआ है। (Iran US Israel War) जब सैन्य मोर्चे पर सीधी जीत नहीं मिलती, तो सेना अक्सर ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ का सहारा लेती है। नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले करना इसी रणनीति का हिस्सा है जनता को इतना परेशान कर दो कि वे अपनी ही सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दें। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में इसे ‘गंदा युद्ध’ माना जाता है।
ईरान का पलटवार
सच्चाई का एक दूसरा पहलू यह भी है कि इस युद्ध में केवल अमेरिका ही सवालों के घेरे में नहीं है। ईरान और उसकी IRGC ने भी खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों के नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है। (Iran US Israel War) विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की कार्रवाइयां भी युद्ध अपराधों की श्रेणी में आती हैं। लेकिन जब दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक महाशक्ति वही काम करने लगे जो एक ‘कथित तानाशाह शासन’ कर रहा है, तो नैतिकता के मापदंड बदल जाते हैं।
