MP Ethanol Scam: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में इथेनॉल (Ethanol) उत्पादन के नाम पर 1160 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। इस मामले में सरकारी अधिकारियों, राइस मिलर्स (Rice Millers) और इथेनॉल प्लांट (Ethanol Plant) संचालकों की कथित मिलीभगत सामने आई है। आरोप है कि इथेनॉल बनाने के लिए आवंटित सरकारी चावल का इस्तेमाल उत्पादन में करने के बजाय उसे दोबारा सरकारी गोदामों में ही खपा दिया गया। मामले की जांच के लिए पुलिस ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया है। अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और कई जिलों में जांच जारी है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के मुताबिक मध्य प्रदेश में इथेनॉल उत्पादन के लिए सरकार की ओर से 5 लाख मीट्रिक टन यानी 50 लाख क्विंटल सरकारी चावल आवंटित किया गया था। इस चावल की अनुमानित कीमत करीब 1160 करोड़ रुपये बताई जा रही है।सबसे अहम बात यह है कि यह सामान्य चावल नहीं बल्कि फोर्टिफाइड चावल (Fortified Rice) था।
इस पोषणयुक्त चावल को कुपोषण और एनीमिया से बचाव के लिए बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों को वितरित किया जाना था।
ऐसे हुआ पूरे मामले का खुलासा
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घोटाले का खुलासा 2 जून को हुई एक खेप से शुरू हुआ। बालाघाट (Balaghat) के नवेगांव गोदाम से सरकारी चावल से भरे तीन ट्रक छिंदवाड़ा (Chhindwara) के बोरगांव स्थित एवीजे इथेनॉल प्लांट के लिए रवाना हुए थे। सरकारी रिकॉर्ड में इन ट्रकों को इथेनॉल उत्पादन के लिए भेजा गया था।
लेकिन 3 जून को जांच के दौरान इन तीन ट्रकों में से एक ट्रक इथेनॉल प्लांट पहुंचने के बजाय बालाघाट की संचेती राइस मिल में खड़ा मिला। वहीं बाकी दो ट्रक भी अपने तय गंतव्य छिंदवाड़ा नहीं पहुंचे। इसी सुराग के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हुई।
एसआईटी जांच में कई बड़े खुलासे
इसी सुराग के आधार पर पुलिस ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया। अब तक बालाघाट, छिंदवाड़ा और सिवनी (Seoni) में जांच की जा चुकी है। जांच के दौरान 12 ट्रकों को जब्त किया गया है। इसके अलावा ट्रांसपोर्टर्स (Transporters) सहित 40 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की जा चुकी है। इस मामले में अब तक चार लोगों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
ऐसे चलता था पूरा खेल
जांच में सामने आया कि इस पूरे घोटाले का तरीका बेहद सुनियोजित था। इथेनॉल प्लांट संचालकों को सरकार की ओर से फोर्टिफाइड चावल 2320 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराया जाता था। जबकि खुले बाजार में इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला टूटा हुआ चावल लगभग 2100 रुपये प्रति क्विंटल में आसानी से मिल जाता था।
ऐसे में प्लांट संचालक सरकारी फोर्टिफाइड चावल से इथेनॉल बनाने के बजाय उसे 2800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से राइस मिलर्स को बेच देते थे। इसके बाद राइस मिलर्स उसी चावल को नई बोरियों में भरकर कस्टम मिल्ड चावल (Custom Milled Rice) के रूप में दोबारा सरकारी गोदामों में जमा कर देते थे।
राइस मिलर्स को ऐसे होता था मोटा फायदा
इस पूरे खेल में राइस मिलर्स को कई स्तर पर फायदा होता था। उन्हें धान से चावल तैयार करने की मिलिंग प्रक्रिया का खर्च नहीं उठाना पड़ता था। इसके बावजूद वे सरकार से मिलिंग चार्ज भी वसूल लेते थे। वहीं मिलिंग के लिए मिला असली धान खुले बाजार में बेचकर अलग से मोटा मुनाफा कमाया जाता था। इस तरह सरकारी चावल का कई बार इस्तेमाल दिखाकर करोड़ों रुपये का फर्जीवाड़ा किया गया।
नियमों की अनदेखी से हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा
जांच में यह भी सामने आया कि फर्स्ट इन फर्स्ट आउट (FIFO) नियम के अनुसार गोदामों में पहले से रखा पुराना चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित किया जाना चाहिए था। लेकिन कुछ अधिकारियों ने नियमों को दरकिनार करते हुए नया फोर्टिफाइड चावल ही आवंटित कर दिया।आरोप है कि दलालों के जरिए चावल आवंटन की गोपनीय जानकारी पहले ही संबंधित लोगों तक पहुंचा दी जाती थी। इसके अलावा पूरे सिस्टम की निगरानी भी पूरी तरह फेल रही। राइस मिलों के बिजली बिल, लेबर रिकॉर्ड और मिलिंग के लिए दिए गए धान की नियमित जांच नहीं की गई। इसी लापरवाही का फायदा उठाकर यह कथित फर्जीवाड़ा लंबे समय तक चलता रहा।
