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नौ दुनिया : देश विदेश की बड़ी खबरें > News > मनोरंजन > Nana Patekar Life Story: कभी पोस्टर रंगे, कभी थिएटर में अभिनय किया, फिर बने हिंदी सिनेमा की आवाज; ऐसी है नाना पाटेकर की कहानी
मनोरंजन

Nana Patekar Life Story: कभी पोस्टर रंगे, कभी थिएटर में अभिनय किया, फिर बने हिंदी सिनेमा की आवाज; ऐसी है नाना पाटेकर की कहानी

Puja Shrivastava
Last updated: 2026/10/08 at 11:43 पूर्वाह्न
Puja Shrivastava
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13 Min Read
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Nana Patekar Life Story: “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने?… यह मुसलमान का खून, यह हिंदू का खून… बता इसमें मुसलमान का कौन सा और हिंदू का कौन सा?”

Contents
Nana Patekar Life Story: और फिर वही आवाज गूंजती है….’साले, अपने देश को संभालो…’बचपन में ही समझ गए थे जिंदगी की मुश्किलेंपोस्टर से थिएटर तक पहुंचा सफर‘परिंदा’ ने दिखाया कि नाना सिर्फ हीरो नहीं हैं‘तिरंगा’ और ‘क्रांतिवीर’ ने बना दिया अलग पहचान वाला अभिनेता‘खामोशी’ में आवाज के बिना भावनाएं बोलती रहींपुलिस अधिकारी से राजनेता तक, हर किरदार में अलग चेहरा‘वेलकम’ ने गुस्सैल अभिनेता को कॉमेडी का बादशाह भी बना दियालेकिन 2007 की ‘वेलकम’ ने इस छवि को पूरी तरह बदल दिया।‘नटसम्राट’ में जैसे अपनी ही जिंदगी के रंग दिखाई दिए

Nana Patekar Life Story: और फिर वही आवाज गूंजती है….’साले, अपने देश को संभालो…’

सिनेमा के पर्दे पर जब नाना पाटेकर यह संवाद बोलते हैं तो वह सिर्फ एक अभिनेता की आवाज नहीं लगती। उसमें गुस्सा है, दर्द है, सवाल है और उस आम आदमी की बेचैनी है, जो अपने आसपास की दुनिया को बदलते हुए देख रहा है। ‘क्रांतिवीर’ का यह दृश्य हिंदी सिनेमा के उन पलों में शामिल हो गया, जिन्हें लोग फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रखते हैं।

Also Read –Nana Patekar Passes Away: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन, गोवा में पड़ा था हार्ट अटैक

नाना पाटेकर की खासियत सिर्फ उनका अभिनय नहीं है। उनकी आवाज, चेहरे के भाव और संवाद बोलने का अंदाज मिलकर एक ऐसा असर पैदा करते हैं, जो पर्दे और दर्शक के बीच की दूरी खत्म कर देता है। शायद यही वजह है कि उन्होंने कभी नायक, कभी खलनायक, कभी पुलिस अधिकारी और कभी एक टूटे हुए कलाकार का किरदार निभाया, लेकिन हर भूमिका में अपनी अलग पहचान छोड़ दी।

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लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी आसान नहीं थी। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने पोस्टर पेंट किए, मराठी रंगमंच पर अभिनय किया और आर्थिक मुश्किलों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। एक साधारण शुरुआत से हिंदी और मराठी सिनेमा के बड़े कलाकार बनने तक का उनका सफर अपने आप में एक सुपर हिट फिल्म की स्क्रिप्ट है।

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बचपन में ही समझ गए थे जिंदगी की मुश्किलें

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ। उनका पूरा नाम विश्वनाथ पाटेकर है। बचपन का दौर बहुत सुविधाओं वाला नहीं था। आर्थिक तंगी ने उन्हें कम उम्र में ही काम की दुनिया से परिचित करा दिया।

यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया। शायद इसलिए उनके अभिनय में आम आदमी की तकलीफ इतनी सहजता से दिखाई देती है। वह किरदार को केवल निभाते नहीं थे, बल्कि उसकी बेचैनी, गुस्से और कमजोरी को अपने अभिनय में उतार देते थे।

युवा उम्र में उन्होंने जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की। कला की पढ़ाई ने उनके भीतर के कलाकार को दिशा दी, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उन्हें छोटे-मोटे काम भी करने पड़े।

फिल्मों में पहचान बनने से पहले वह फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम करते थे। उस दौर में हाथ से बड़े-बड़े पोस्टर तैयार किए जाते थे। रंग और ब्रश के साथ उनका यह रिश्ता बाद में अभिनय की दुनिया में उनकी दृश्यात्मक समझ का भी हिस्सा बना।

पोस्टर से थिएटर तक पहुंचा सफर

नाना पाटेकर का असली कलाकार रंगमंच पर निखरा। उन्होंने मराठी थिएटर में अभिनय किया और मंच पर खुद को लगातार तराशा।

थिएटर ने उन्हें संवाद बोलने, भावनाओं को नियंत्रित करने और दर्शकों के सामने किरदार को जीवंत करने की कला सिखाई। यही प्रशिक्षण बाद में फिल्मों में उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

उनके अभिनय में जो ठहराव दिखाई देता है, वह सिर्फ कैमरे के सामने सीखी हुई कला नहीं है। उसके पीछे रंगमंच का लंबा अनुभव है। मंच पर अभिनेता को बिना किसी कट या रीटेक के दर्शकों तक अपनी बात पहुंचानी होती है। नाना पाटेकर ने इसी कला को फिल्मों में अपने अंदाज में इस्तेमाल किया। उनका संवाद बोलना भी इसी वजह से अलग दिखाई देता है। वह सिर्फ शब्द नहीं बोलते, बल्कि शब्दों के पीछे छिपी भावना को चेहरे और आवाज से सामने लाते हैं।

‘परिंदा’ ने दिखाया कि नाना सिर्फ हीरो नहीं हैं

1989 में आई ‘परिंदा’ नाना पाटेकर के करियर की अहम फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के खतरनाक गैंगस्टर का किरदार निभाया। यह किरदार पारंपरिक खलनायक से अलग था। उसमें हिंसा के साथ मानसिक अस्थिरता और डर पैदा करने वाली बेचैनी भी थी। नाना ने इसे इस तरह निभाया कि दर्शकों को उनके किरदार से नफरत भी हुई और अभिनय की तारीफ करने से वे खुद को रोक भी नहीं पाए। ‘परिंदा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। यह उनके अभिनय करियर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

‘तिरंगा’ और ‘क्रांतिवीर’ ने बना दिया अलग पहचान वाला अभिनेता

1993 की ‘तिरंगा’ में नाना पाटेकर ने राजकुमार के साथ काम किया। फिल्म में उनका इंस्पेक्टर शिवाजीराव वाघले का किरदार दर्शकों के बीच खूब लोकप्रिय हुआ।

इसके बाद 1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ ने उनके करियर को एक नई ऊंचाई दी। प्रताप नारायण तिलक के किरदार में नाना ने जिस आक्रोश और संवेदना को पर्दे पर उतारा, वह लंबे समय तक दर्शकों के बीच चर्चा का विषय रहा।

फिल्म का वह दृश्य, जिसमें उनका किरदार धर्म के नाम पर इंसानों के बीच खड़ी की गई दीवार पर सवाल उठाता है, आज भी उनके सबसे प्रभावशाली अभिनय क्षणों में गिना जाता है।

उनका एक संवाद….’साले, अपने देश को संभालो, वरना यह जो कलम हमारे हाथ में है न, यह तुम्हारे हाथों में बंदूक थमा देगी। …सिर्फ फिल्म का संवाद नहीं रह गया। यह उस दृश्य की भावनात्मक ताकत बन गया।

‘क्रांतिवीर’ के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

‘खामोशी’ में आवाज के बिना भावनाएं बोलती रहीं

1996 में आई ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में नाना ने एक मूक-बधिर पिता का किरदार निभाया। यहां उनके पास संवादों के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने की सुविधा ही नहीं थी। लेकिन यही इस भूमिका की सबसे बड़ी चुनौती थी। चेहरे के भाव, आंखों की नमी और शरीर की भाषा के जरिए उन्होंने एक पिता के प्रेम और दर्द को सामने रखा। यह भूमिका बताती है कि एक बड़ा अभिनेता शब्दों का मोहताज नहीं होता।

उसी वर्ष ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।

पुलिस अधिकारी से राजनेता तक, हर किरदार में अलग चेहरा

नाना पाटेकर की फिल्मों की खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को किसी एक तरह के किरदार में बंद नहीं किया।

‘अब तक छप्पन’ में वह एनकाउंटर स्पेशलिस्ट साधु आगाशे बने। यह किरदार सख्त था, लेकिन उसके भीतर की थकान और अकेलापन भी दिखाई देता था।

‘अपहरण’ में उन्होंने तबरेज आलम का नकारात्मक और प्रभावशाली किरदार निभाया। ‘टैक्सी नंबर 9211’ में वह राघव शास्त्री नाम के गुस्सैल लेकिन संवेदनशील कैब ड्राइवर के रूप में नजर आए।

फिर ‘राजनीति’ में उनका बृजगोपाल का किरदार सामने आया, जिसे महाभारत के कृष्ण से प्रेरित माना गया। यानी कभी पुलिस की वर्दी, कभी अपराध की दुनिया और कभी राजनीति—नाना हर बार अपने अभिनय का एक नया रंग लेकर आए।

‘वेलकम’ ने गुस्सैल अभिनेता को कॉमेडी का बादशाह भी बना दिया

नाना पाटेकर को लेकर दर्शकों के मन में एक छवि बन चुकी थी….गंभीर, आक्रामक और दमदार संवाद बोलने वाला अभिनेता।

लेकिन 2007 की ‘वेलकम’ ने इस छवि को पूरी तरह बदल दिया।

फिल्म में उन्होंने डॉन उदय शेट्टी का किरदार निभाया। अनिल कपूर के मज्नू भाई के साथ उनकी जुगलबंदी ने फिल्म को अलग ही रंग दे दिया।

नाना की टाइमिंग, चेहरे के भाव और संवाद बोलने के अंदाज ने उदय शेट्टी को यादगार बना दिया। यही वह दौर था जब दर्शकों ने महसूस किया कि यह अभिनेता गंभीर भूमिकाओं के साथ कॉमेडी भी उतनी ही सहजता से कर सकता है।

‘वेलकम’ उनके सबसे सफल व्यावसायिक फिल्मों में शामिल रही और उदय शेट्टी आज भी उनके लोकप्रिय किरदारों में गिना जाता है।

‘नटसम्राट’ में जैसे अपनी ही जिंदगी के रंग दिखाई दिए

2016 की मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल है। फिल्म में उन्होंने एक रिटायर्ड रंगमंच कलाकार का किरदार निभाया।

एक ऐसा कलाकार, जिसने पूरी जिंदगी मंच को दे दी, लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर उसे अपने ही जीवन में अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

नाना ने इस किरदार को जिस गहराई से निभाया, उसमें थिएटर से उनका पुराना रिश्ता भी महसूस होता है। कई दृश्यों में ऐसा लगता है जैसे किरदार और अभिनेता के बीच की सीमा ही खत्म हो गई हो।

सिर्फ अभिनेता नहीं, समाज से जुड़े कलाकार भी हैं नाना

नाना पाटेकर की पहचान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही। भारतीय प्रादेशिक सेना से उनका जुड़ाव भी चर्चा में रहा है और उन्हें मानद कैप्टन की रैंक से सम्मानित किया गया।

सामाजिक कामों में भी वह सक्रिय रहे हैं। महाराष्ट्र के किसानों की मदद के लिए ‘नाम फाउंडेशन’ के जरिए किए गए कामों ने उन्हें पर्दे के बाहर भी लोगों के करीब पहुंचाया। उनकी सार्वजनिक छवि में एक बात लगातार दिखाई देती है वह है उनकी सादगी। चमक-दमक वाली फिल्मी दुनिया में रहते हुए भी नाना पाटेकर का व्यक्तित्व आम आदमी के काफी करीब दिखाई देता है।

पुरस्कारों ने भी उनके अभिनय की गवाही दी

नाना पाटेकर को अभिनय के लिए कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें ‘परिंदा’ और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता तथा ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ खलनायक जैसी अलग-अलग श्रेणियों में सम्मान हासिल किए।

2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।

यह सम्मान सिर्फ एक अभिनेता के रूप में उनकी उपलब्धियों को नहीं दर्शाते, बल्कि यह भी बताते हैं कि उन्होंने भारतीय सिनेमा में कई दशकों तक अपनी अलग जगह बनाए रखी।

नाना पाटेकर की असली पहचान आखिर क्या है?

नाना पाटेकर को केवल ‘क्रांतिवीर’ के गुस्से, ‘परिंदा’ की खतरनाक आंखों या ‘वेलकम’ की कॉमेडी से समझना मुश्किल है। उनकी कहानी पोस्टर पर रंग भरने वाले एक संघर्षशील युवक से शुरू होती है और ऐसे अभिनेता तक पहुंचती है, जिसकी आवाज सुनते ही दर्शक ठहरकर उसकी बात सुनने लगते हैं।

उनके अभिनय में चमक से ज्यादा अनुभव है। संवाद में दिखावे से ज्यादा वजन है और किरदारों में बनावट से ज्यादा जिंदगी।

शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी जब नाना पाटेकर किसी फिल्म में संवाद बोलते हैं तो दर्शक सिर्फ स्क्रीन नहीं देखते….वे उस आवाज में अपना गुस्सा, अपना दर्द और अपनी जिंदगी का कोई न कोई हिस्सा तलाश लेते हैं और यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी जीत है।

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