Israel Lebanon Strike 2026: कई दशकों से इजरायल और लेबनान के बीच रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं और दोनों देश सीधे बातचीत से हमेशा बचते रहे हैं। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने कैबिनेट को लेबनान के साथ सीधे बातचीत शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है, बल्कि इसके पीछे जंग का दबाव, क्षेत्रीय राजनीति और अमेरिका का लगातार हस्तक्षेप बड़ी वजह बना है।
Israel Lebanon Strike 2026: लेबनान में क्या हो रहा है?
इस जंग के बीच लेबनान में हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। इजरायल ने वहां बड़े पैमाने पर एयरस्ट्राइक तेज कर दी हैं। जिसमें बेरूत के दक्षिणी इलाकों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है। इसके साथ ही जमीनी हमले भी बढ़ा दिए गए हैं और दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना ने अपनी कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है।
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वहीं इजरायल ने कई गांवों को हिजबुल्लाह के गढ़ बताते हुए वहां से लाखों लोगों को पलायन करने का आदेश दिया है। लेबनानी अधिकारियों के मुताबिक तबाही का स्तर अभूतपूर्व है। लगातार हमलों के बाद सरकार ने शोक दिवस तक घोषित किया, जबकि अस्पतालों में घायलों और मृतकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वहां संभालना मुश्किल हो गया है। (Israel Lebanon Strike 2026) रफीक हरीरी यूनिवर्सिटी अस्पताल के बाहर एंबुलेंस लगातार पहुंच रही हैं, जिनमें हमलों में मारे गए लोगों के शव लाए जा रहे हैं।
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हजारों लोगों की मौत, दोनों तरफ नुकसान
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मार्च की शुरुआत से अब तक कम से कम 1888 लोगों की मौत हो चुकी है और 6000 से ज्यादा लोग घायल हैं। वहीं इजरायल की तरफ भी हिजबुल्लाह के रॉकेट हमलों में कम से कम दो लोगों की जान गई है।
यह टकराव 2 मार्च को शुरू हुआ था जब हिजबुल्लाह ने इजरायल पर मिसाइलें दागीं, जिसके बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई में अपने हमले और तेज कर दिए। (Israel Lebanon Strike 2026) हिजबुल्लाह ने भी अपनी कार्रवाई जारी रखी और एक ही दिन में करीब 20 हमले करने का दावा किया, जिसमें लेबनान के अंदर इजरायली वाहनों को निशाना बनाना और उत्तरी इजरायल में रॉकेट फायर शामिल है।
इजरायल का कहना है कि उसने इस अभियान के दौरान हिजबुल्लाह से जुड़े कई बड़े नेताओं को भी मार गिराया है, जिनमें नईम कासिम के करीबी सहयोगी अली यूसुफ हर्षी भी शामिल हैं।
पहले बातचीत से इनकार, अब क्यों बदला रुख
इस बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हालात इतने खराब हैं तो बातचीत कैसे शुरू हो रही है। दरअसल संघर्ष के शुरुआती दौर में लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने सीधे बातचीत की इच्छा जताई थी और रिश्तों को सामान्य करने का संकेत भी दिया था, लेकिन इजरायल ने इसे ठुकरा दिया था।
उस समय इजरायल का मानना था कि लेबनान की सरकार हिजबुल्लाह के खिलाफ ठोस कदम उठाने की स्थिति में नहीं है और ऐसा करने से वहां गृह युद्ध का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए इजरायल ने उस वक्त कूटनीति के बजाय सैन्य दबाव को प्राथमिकता दी।
अमेरिका-ईरान सीजफायर के बाद बदला समीकरण
हालात तब बदले जब अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का संघर्ष विराम हुआ। इस समझौते के बाद ईरान ने साफ संकेत दिया कि लेबनान में इजरायल की कार्रवाई को भी कम करना होगा।
इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सीधे हस्तक्षेप किया और नेतन्याहू से हमले कम करने और बातचीत शुरू करने की अपील की। (Israel Lebanon Strike 2026) ट्रंप ने कहा कि उन्होंने “बीबी” यानी नेतन्याहू से बात की है और अब हालात को थोड़ा शांत करना जरूरी है। अमेरिका के इस दबाव और क्षेत्रीय परिस्थितियों के चलते आखिरकार इजरायल ने बातचीत के लिए हामी भर दी।
बातचीत के बीच भी जारी रहेगा हमला
हालांकि बातचीत के लिए तैयार होने के बावजूद इजरायल ने अपने सैन्य अभियान को रोकने की कोई बात नहीं कही है। नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।
इजरायल इस बातचीत को एक बड़े राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देख रहा है। वॉशिंगटन स्थित उसके दूतावास ने इसे औपचारिक शांति वार्ता की शुरुआत बताया है।
नेतन्याहू के दो मुख्य लक्ष्य हैं, पहला हिजबुल्लाह को निशस्त्र करना और दूसरा इजरायल और लेबनान के बीच शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करना। इसके अलावा उत्तरी सीमा पर बफर जोन बनाने और लेबनान सरकार से हिजबुल्लाह से जुड़े मंत्रियों को हटाने जैसे प्रस्ताव भी चर्चा में हैं।
लेबनान की शर्त, पहले सीजफायर फिर बातचीत
वहीं लेबनान का रुख बिल्कुल अलग है। राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने साफ कहा है कि किसी भी बातचीत से पहले संघर्ष विराम होना जरूरी है। उनके मुताबिक यही एकमात्र समाधान है।
हिजबुल्लाह ने भी सीधे तौर पर इजरायल के साथ बातचीत का विरोध किया है। उसके नेता अली फय्याद ने कहा है कि सरकार को पहले सीजफायर सुनिश्चित करना चाहिए, उसके बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए।
अमेरिका निभा रहा है अहम भूमिका
इस पूरे मामले में अमेरिका की भूमिका बेहद अहम है। इजरायल और लेबनान के प्रतिनिधि मंगलवार को वॉशिंगटन में मिलने वाले हैं। (Israel Lebanon Strike 2026) लेबनान के राष्ट्रपति ने बताया कि दोनों पक्षों के बीच फोन पर बातचीत हो चुकी है और अब अमेरिकी विदेश विभाग में बैठक होगी।इजरायल की तरफ से अमेरिका में उसके राजदूत येचियल लेटर हिस्सा ले सकते हैं, जबकि लेबनान की तरफ से नादा हमादेह मोआवद शामिल होंगी।
आगे की बातचीत के लिए भी तैयारी शुरू हो चुकी है। (Israel Lebanon Strike 2026) नेतन्याहू ने अपने करीबी सहयोगी रोन डर्मर को बातचीत का नेतृत्व सौंपा है, जबकि लेबनान ने पूर्व राजदूत सिमोन करम को अपनी टीम का प्रमुख बनाया है, हालांकि ये दोनों शुरुआती दौर में शामिल नहीं होंगे।
बड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार
यहां बातचीत शुरू होने के बावजूद कई बड़ी चुनौतियां सामने हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी तक कोई सीजफायर लागू नहीं हुआ है। लेबनान इसे जरूरी मानता है, जबकि इजरायल सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है।
हिजबुल्लाह का विरोध भी एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि उसकी सैन्य गतिविधियां किसी भी समझौते को कमजोर कर सकती हैं। इसके अलावा सीमा विवाद, ब्लू लाइन और शेबा फार्म्स जैसे मुद्दे भी अब तक अनसुलझे हैं।
सबसे अहम बात यह है कि 1948 से दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं है और वे तकनीकी रूप से अब भी युद्ध की स्थिति में हैं। (Israel Lebanon Strike 2026) 1982 से 2000 तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा जैसे पुराने जख्म आज भी भरोसे की कमी को और गहरा करते हैं।
आखिर क्या है इजरायल की मंशा?
दरअसल इजरायल का यह कदम एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। (Israel Lebanon Strike 2026) वह लेबनान सरकार के साथ सीधे बातचीत करके अपने पुराने लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है, जिसमें सबसे अहम हिजबुल्लाह को कमजोर करना और उत्तरी सीमा पर स्थिरता लाना है।
इसके साथ ही नेतन्याहू का “शांतिपूर्ण संबंध” वाला बयान यह संकेत देता है कि इजरायल सिर्फ मौजूदा टकराव खत्म करने से आगे बढ़कर एक स्थायी राजनीतिक समझौते की दिशा में भी सोच रहा है, हालांकि यह राह अभी भी काफी मुश्किल नजर आती है।
