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नौ दुनिया : देश विदेश की बड़ी खबरें > News > विदेश > SCO Summit 2026: मोदी, जिनपिंग और पुतिन एक ही टेबल पर, SCO में क्या पक रहा है?
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SCO Summit 2026: मोदी, जिनपिंग और पुतिन एक ही टेबल पर, SCO में क्या पक रहा है?

Puja Shrivastava
Last updated: 2026/08/31 at 3:28 अपराह्न
Puja Shrivastava
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10 Min Read
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SCO Summit 2026: 31 अगस्त 2026. किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में दुनिया की नजरें एक ऐसे मंच पर हैं, जहां एक ही जगह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे बड़े नेता मौजूद हैं. मौका है ‘शंघाई सहयोग संगठन’ यानी SCO के 26वें शिखर सम्मेलन का. दो दिन चलने वाला ये सम्मेलन 31 अगस्त और 1 सितंबर को हो रहा है और इस बार SCO अपने गठन के 25 साल भी पूरे कर रहा है. भारत की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी इसमें हिस्सा ले रहे हैं.

Contents
SCO Summit 2026: पहले समझिए SCO क्या हैक्या SCO NATO जैसा सैन्य गठबंधन है?फिर भारत इसमें क्यों है?चीन और भारत की कहानी भी इसी टेबल पर हैपाकिस्तान की मौजूदगी भारत के लिए क्यों अहम है?रूस के साथ रिश्ते और पश्चिम एशिया का संकटCentral Asia भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?आम भारतीय के लिए SCO का मतलब क्या है?

मगर सवाल ये है कि SCO आखिर है क्या? क्या ये NATO जैसा कोई सैन्य गठबंधन है? भारत इसमें क्यों है, जबकि इसी संगठन में चीन और पाकिस्तान भी सदस्य हैं? और मोदी, जिनपिंग और पुतिन का एक ही मंच पर होना भारत के लिए कितना अहम है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

SCO Summit 2026: पहले समझिए SCO क्या है

SCO यानी ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की शुरुआत 2001 में हुई थी. इसकी जड़ें 1996 में बने ‘शंघाई-5’ (Shanghai Five) समूह में थीं, जिसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे. 2001 में संगठन का औपचारिक गठन हुआ और बाद में इसका दायरा लगातार बढ़ता गया. (SCO Summit 2026) भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने, जबकि बेलारूस 2024 में सदस्य बना. आज SCO में कुल 10 सदस्य देश हैं. इनमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं.

SCO का फोकस मुख्य तौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद, आर्थिक सहयोग, कनेक्टिविटी और सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर है. यानी इसे सिर्फ चीन और रूस का क्लब समझना भी सही नहीं होगा.

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क्या SCO NATO जैसा सैन्य गठबंधन है?

नहीं. ये अंतर समझना बहुत जरूरी है. NATO में सामूहिक रक्षा का सिद्धांत है. यानी किसी सदस्य देश पर हमला होने पर बाकी सदस्य उसकी रक्षा को लेकर एक निश्चित सैन्य प्रतिबद्धता रखते हैं. SCO का ऐसा कोई आर्टिकल-5 जैसा प्रावधान नहीं है. ये कोई संयुक्त सेना वाला सैन्य गठबंधन नहीं है.

SCO में सुरक्षा सहयोग जरूर होता है और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद से निपटने के लिए सदस्य देश मिलकर काम करते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत, चीन, रूस और पाकिस्तान किसी सैन्य गठबंधन के सदस्य बन गए हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो SCO को एक बहुपक्षीय क्षेत्रीय संगठन समझिए, न कि NATO का एशियाई संस्करण.

फिर भारत इसमें क्यों है?

यहीं से भारत के लिए SCO की असली अहमियत शुरू होती है. भारत के सामने एक दिलचस्प स्थिति है. SCO में चीन और पाकिस्तान दोनों हैं, जिनके साथ भारत के रिश्ते बेहद जटिल रहे हैं. इसके बावजूद भारत ने संगठन के अंदर रहकर अपनी बात रखने का रास्ता चुना है.

भारत के लिए SCO Central Asia तक अपनी पहुंच बनाए रखने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है. कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देश भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और कनेक्टिविटी के लिहाज से अहम हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस यात्रा से पहले भारत की SCO प्राथमिकताओं को Security, Connectivity और Opportunity यानी सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर के रूप में रेखांकित किया है. उन्होंने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से मुक्त क्षेत्र की जरूरत पर भी जोर दिया है.

चीन और भारत की कहानी भी इसी टेबल पर है

SCO की सबसे दिलचस्प तस्वीर शायद यही है. एक तरफ मोदी और शी जिनपिंग एक ही बहुपक्षीय मंच पर हैं, दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी खत्म नहीं हुई है.

ऐसे में SCO भारत को चीन के साथ बातचीत का एक अतिरिक्त मंच देता है. दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरें या बिगड़ें, बहुपक्षीय मंचों पर संवाद की गुंजाइश बनी रहती है.

31 अगस्त को बिश्केक में मोदी और जिनपिंग की संभावित मुलाकात पर भी नजर है. वहीं रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ मोदी की द्विपक्षीय बातचीत भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. SCO जैसे मंच का फायदा यही है कि एक ही यात्रा में कई देशों के नेताओं से बातचीत की संभावना बनती है.

पाकिस्तान की मौजूदगी भारत के लिए क्यों अहम है?

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को देखते हुए SCO की टेबल और भी दिलचस्प हो जाती है. भारत लंबे समय से आतंकवाद के मुद्दे को SCO जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस यात्रा के संदर्भ में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद को क्षेत्रीय शांति के लिए चुनौती बताया है.

दूसरी तरफ पाकिस्तान भी SCO का पूर्ण सदस्य है. इसलिए यहां भारत को पाकिस्तान के साथ किसी द्विपक्षीय मंच की तरह बातचीत करने के बजाय एक बड़े बहुपक्षीय ढांचे में अपनी सुरक्षा चिंताओं को रखने का मौका मिलता है.

ये भी पढ़ें –Ujjain Cremation Ground Video: ‘आज इंसान का मांस खाएंगे…’, जलती चिता के पास महिला का VIDEO वायरल, संतों में आक्रोश

यानी SCO भारत के लिए सिर्फ दोस्त देशों के साथ बैठने की जगह नहीं है. ये उन देशों के साथ भी एक टेबल साझा करने का मंच है, जिनके साथ भारत के रिश्ते बेहद कठिन हैं.

रूस के साथ रिश्ते और पश्चिम एशिया का संकट

SCO में रूस की मौजूदगी भारत के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रही है. भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग का लंबा इतिहास है.

इस बार वैश्विक परिस्थितियां भी अलग हैं. यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, ऊर्जा सुरक्षा और बदलती वैश्विक राजनीति के बीच रूस और चीन की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है. ईरान भी SCO का सदस्य है, इसलिए पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट इस सम्मेलन की चर्चा से अलग नहीं रखा जा सकता.

भारत के लिए चुनौती ये है कि उसे रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक रिश्ते भी संभालने हैं, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा भी मैनेज करनी है और Central Asia में अपनी मौजूदगी भी बढ़ानी है.

Central Asia भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

Central Asia भारत के लिए सिर्फ नक्शे का एक इलाका नहीं है. यहां ऊर्जा संसाधन हैं, बड़ा बाजार है और भारत की सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व भी है.

समस्या ये है कि भारत की भौगोलिक पहुंच आसान नहीं है. पाकिस्तान के रास्ते जमीन से सीधी कनेक्टिविटी की अपनी राजनीतिक अड़चनें हैं. ऐसे में भारत को वैकल्पिक रास्तों और बहुपक्षीय सहयोग की जरूरत पड़ती है.

ये भी पढ़ें –Nepal Flash Floods: बचने के लिए 5 मिनट भी…महीनों पहले चीन से मांगी थी अर्ली वॉर्निंग, नेपाल में तबाही का जिम्मेदार कौन?

SCO के जरिए भारत कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देशों के साथ राजनीतिक और आर्थिक संपर्क मजबूत कर सकता है. प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा दौरा भी इसी व्यापक Central Asia रणनीति का हिस्सा है. उज्बेकिस्तान यात्रा में व्यापार, निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा और शिक्षा जैसे मुद्दे एजेंडे में रहे हैं.

आम भारतीय के लिए SCO का मतलब क्या है?

अगर इसे बहुत आसान भाषा में समझें तो SCO की चर्चा सीधे आपके घर तक आती हुई शायद नजर न आए, लेकिन इसके फैसलों का असर लंबे समय में हो सकता है.

ऊर्जा की कीमतों से लेकर व्यापारिक रास्तों तक, आतंकवाद से लेकर क्षेत्रीय सुरक्षा तक और Central Asia में भारतीय कारोबार के अवसरों से लेकर रूस और चीन के साथ रिश्तों तक, कई मुद्दे इससे जुड़े हैं.

इसलिए बिश्केक में मोदी, जिनपिंग और पुतिन की एक ही टेबल पर मौजूदगी सिर्फ फोटो का मामला नहीं है. असली कहानी ये है कि भारत ऐसे समय में अपनी जगह कहां बनाता है, जब दुनिया कई शक्ति केंद्रों में बंटती दिखाई दे रही है.

SCO भारत के लिए किसी एक देश के साथ खड़े होने का मंच नहीं है. ये अलग-अलग देशों के साथ एक साथ रिश्ते संभालने की कूटनीतिक टेबल है. और भारत की मौजूदा विदेश नीति में यही संतुलन शायद सबसे बड़ा खेल है.

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