US Behind India Protests: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रचारक मार्कंडेय काटजू ने भारत में चल रहे मौजूदा आंदोलन (Protests) को लेकर एक विवादित दावा किया है। उन्होंने आशंका जताई है कि इन आंदोलनों के पीछे अमेरिकी सरकार (US Government) हो सकती है और वह इसे गुप्त रूप से फंडिंग (Funding) कर रही हो सकती है। काटजू ने अपने इस दावे को भारत के ब्रिक्स (BRICS) में सक्रिय रोल और रूस-चीन के साथ बढ़ते रिश्तों से जोड़ा है।
हालांकि, काटजू का यह दावा अभी तक उनकी राय और आशंका तक सीमित है। इसे साबित करने वाला कोई पुष्ट तथ्य सामने नहीं आया है।
US Behind India Protests: एक्स पर पोस्ट कर कही ये बात
मार्कंडेय काटजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें इस बात पर हैरानी नहीं होगी अगर अमेरिकी सरकार भारत में चल रहे मौजूदा आंदोलन के पीछे हो और उसे गुप्त रूप से फंड दे रही हो।
काटजू के मुताबिक, अमेरिका इस वजह से नाराज हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स में शामिल हुए हैं। उन्होंने ब्रिक्स के नेतृत्व में चीन और रूस की भूमिका का जिक्र करते हुए इन दोनों देशों को अमेरिका का दुश्मन बताया।
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काटजू का संकेत था कि मोदी सरकार रूस और चीन के साथ लगातार अपने संबंध मजबूत कर रही है और इसी वजह से वॉशिंगटन भारत के भीतर असंतोष को हवा दे सकता है।
BRICS से क्यों जोड़ा पूरा मामला?
काटजू के इस दावे का आधार भारत की मौजूदा विदेश नीति और ब्रिक्स में उसकी भूमिका को माना जा रहा है। भारत ने सितंबर 2026 में नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) की मेजबानी की थी।
इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के साथ द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की बात भी कही थी।
यही वजह है कि काटजू ने भारत के रूस और चीन के साथ बढ़ते रिश्तों को अमेरिका की नाराजगी से जोड़ते हुए आंदोलन के पीछे कथित अमेरिकी भूमिका की आशंका जताई है।
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रूस से भारत की बढ़ती नजदीकी भी बनी आधार
भारत और रूस के बीच लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। भारत रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भी है। (US Behind India Protests) दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
भारत की रूस से तेल खरीद और दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों को भी काटजू के तर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है। उनका कहना है कि भारत जिस तरह रूस और चीन के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है, वह अमेरिका के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
भारत-अमेरिका के बीच मतभेद भी हैं, लेकिन रिश्ते जारी
भारत और अमेरिका (India-US Relations) के बीच कई मुद्दों पर मतभेद जरूर हैं। टैरिफ (Tariff), व्यापार और भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद जैसे मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच असहमति रही है।
हालांकि, इसके बावजूद भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग जारी है। दोनों देशों के संबंध केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं हैं और कई क्षेत्रों में दोनों के बीच सहयोग भी बना हुआ है।
ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका पर भी नजर
मार्कंडेय काटजू का बयान ऐसे समय आया है, जब भारत ब्रिक्स के जरिए ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। साथ ही भारत रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों को भी संतुलित तरीके से आगे बढ़ा रहा है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से अलग-अलग शक्तियों के साथ अपने हितों के हिसाब से संबंध बनाए रखने पर केंद्रित रही है। ऐसे में काटजू का दावा इस सवाल को उठाता है कि क्या भारत की स्वतंत्र विदेश नीति से अमेरिका असहज हो सकता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारत में चल रहे मौजूदा आंदोलन के पीछे अमेरिकी सरकार की कथित फंडिंग को लेकर काटजू की ओर से लगाया गया आरोप अभी सिर्फ एक दावा है। इसे साबित करने वाला कोई पुष्ट तथ्य या आधिकारिक प्रमाण इस जानकारी में सामने नहीं आया है।
