Meerut Blue Drum Murder Case: नीला ड्रम हत्याकांड में सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या और उसके शव को छिपाने की कोशिश ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस सनसनीखेज मामले में पुलिस की जांच से लेकर अदालत में गवाहों की पेशी तक, हर कदम पर एक ही चुनौती थी कि कैसे बिना किसी प्रत्यक्षदर्शी के उस खौफनाक वारदात की पूरी कहानी को साबित किया जाए। सबसे पहले पुलिस ने घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्यों, हथियारों की खरीद, शव को ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रम और सीमेंट, मेडिकल कड़ियों तथा आरोपितों की यात्रा से जुड़े तथ्यों को जोड़कर मुकदमे की मजबूत आधारशिला तैयार की।
फिर मामले में 126 सुनवाइयों (64 दिन तक) में चली न्यायिक प्रक्रिया और अभियोजन की ओर से पेश किए गए 22 गवाहों की भूमिका अहम रही। हालांकि, किसी भी आपराधिक मुकदमे में सजा का आधार केवल गवाहों की संख्या नहीं, बल्कि साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनके बीच स्थापित होने वाली कड़ियां होती हैं। इस मामले में भी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अदालत के सामने क्रमवार रखने की चुनौती थी।
Meerut Blue Drum Murder Case: गुमशुदगी की शिकायत से शुरू हुई जांच
सौरभ राजपूत की हत्या का मामला उस समय सामने आया, जब उसके परिजनों को उसकी गुमशुदगी और अनहोनी की आशंका हुई। सौरभ के भाई बबलू की शिकायत के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। शुरुआती पड़ताल में मुस्कान और साहिल की भूमिका पर संदेह गहराया। पुलिस के मुताबिक, दोनों उस समय अपने घर पर नहीं मिले थे। बाद में हिमाचल प्रदेश से लौटने पर उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की गई और घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास शुरू हुआ।
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जांच आगे बढ़ने के साथ ही मामला केवल एक व्यक्ति की गुमशुदगी का नहीं रहा, बल्कि शव को छिपाने और हत्या से पहले तथा बाद की गतिविधियों की तह तक पहुंचने का बन गया। पुलिस को यह पता लगाना था कि वारदात किस तरह अंजाम दी गई, इसमें किन वस्तुओं का इस्तेमाल हुआ और आरोपितों की गतिविधियों से घटनास्थल तक की कड़ी कैसे जुड़ती है।
मेरठ से मनाली-कसौल तक खंगाली गईं गतिविधियां
तत्कालीन मेरठ एसएसपी डॉ. विपिन ताडा के मुताबिक, पुलिस ने मेरठ से मनाली और कसौल तक घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों की पड़ताल की। वारदात के बाद मुस्कान और साहिल के हिमाचल प्रदेश जाने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस ने उनके घर से निकलने, यात्रा के दौरान की गतिविधियों और वापस लौटने तक की कड़ियों को जांच में शामिल किया।
सीसीटीवी कैमरों में दर्ज गतिविधियों और घटनाक्रम से संबंधित लोगों से मिली जानकारी को भी जांच का हिस्सा बनाया गया। पुलिस का प्रयास था कि केवल पूछताछ में सामने आए बयानों पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र साक्ष्यों से भी घटनाओं के क्रम की पुष्टि की जाए।
जांच में हत्या से पहले की तैयारियों, वारदात के दौरान इस्तेमाल की गई वस्तुओं और उसके बाद की गतिविधियों को जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया। यही कड़ियां आगे चलकर अभियोजन के मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।
चाकू-गंडासे की खरीद से ड्रम और सीमेंट तक की पड़ताल
इस हत्याकांड में पुलिस के सामने सबसे अहम सवाल था कि हत्या को अंजाम देने और शव को छिपाने के लिए किन वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया तथा उनकी खरीद से संबंधित तथ्य कैसे साबित किए जाएं। विवेचना के दौरान चाकू और गंडासे की खरीद से लेकर शव को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रम और सीमेंट तक की कड़ियों की जांच की गई।
पुलिस ने घटनाक्रम से संबंधित दुकानदारों और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए। नींद की गोलियों के लिए पर्चा लिखने वाले डॉक्टर तथा संबंधित दुकानदारों को भी गवाहों के रूप में शामिल किया गया। इन गवाहियों का उद्देश्य खरीदारी, दवाओं और अन्य गतिविधियों से जुड़ी परिस्थितियों को अदालत के सामने रखना था।
जांच एजेंसी के लिए यह भी जरूरी था कि हर वस्तु या गतिविधि को केवल संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित गवाहों के बयानों के साथ प्रस्तुत किया जाए। इसी प्रक्रिया के तहत पुलिस ने जुटाए गए तथ्यों को आरोपपत्र यानी चार्जशीट में शामिल किया।
प्रत्यक्षदर्शी नहीं, इसलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य बने अहम
सौरभ राजपूत हत्याकांड की जांच में कोई प्रत्यक्षदर्शी सामने नहीं था। ऐसे मामलों में अभियोजन को घटनाओं की अलग-अलग कड़ियों को इस तरह स्थापित करना पड़ता है कि वे मिलकर एक विश्वसनीय तस्वीर पेश करें। किसी एक परिस्थिति या बयान के बजाय साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला की अहमियत बढ़ जाती है।
पुलिस ने हत्या से पहले की तैयारियों, इस्तेमाल किए गए हथियारों, शव छिपाने में प्रयुक्त सामग्री, यात्रा और आरोपितों की गतिविधियों से जुड़े तथ्यों को एक क्रम में रखा। इसके साथ ही उन लोगों के बयान भी दर्ज किए गए, जिनके पास घटनाक्रम के किसी खास हिस्से से जुड़ी जानकारी थी।
इस मामले में सौरभ की मां रेनू, भाई बबलू और उसके दोस्त से जुड़ी गवाही को भी महत्वपूर्ण बताया गया। परिजनों की गवाही से जहां सौरभ के बारे में जानकारी और घटनाक्रम के कुछ पहलुओं को सामने रखने में मदद मिली, वहीं अन्य गवाहों और भौतिक साक्ष्यों का महत्व घटनाओं की कड़ियों को जोड़ने में था।
चार्जशीट के 22 गवाहों की अदालत में पेशी
पुलिस ने मामले में 22 गवाहों को चार्जशीट में शामिल किया। अभियोजन ने अदालत में इन गवाहों को क्रमवार पेश किया, ताकि घटनाक्रम से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर साक्ष्य रखे जा सकें। जांच में जुटाए गए तथ्यों को अदालत में प्रस्तुत करना और उनकी विश्वसनीयता स्थापित करना मुकदमे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
गवाहों की पेशी के साथ अभियोजन को यह भी स्पष्ट करना था कि अलग-अलग परिस्थितियां एक-दूसरे से कैसे जुड़ती हैं। हथियारों की खरीद, ड्रम और सीमेंट से संबंधित जानकारी, दवाओं की कड़ी, यात्रा से जुड़े तथ्य और परिजनों के बयान, इन सभी को मुकदमे के संदर्भ में देखा गया।
नीले ड्रम केस में सुनवाई के अहम पड़ाव:
मुकदमे का वास्तविक विवरण: विश्वसनीय रिपोर्टों के मुताबिक, मुकदमे में करीब 13 महीने के दौरान 126 सुनवाइयां हुईं और अभियोजन ने 22 गवाह पेश किए।
30 सितंबर 2026: मेरठ की जिला अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को हत्या तथा साक्ष्य मिटाने के अपराध में दोषी ठहराया।
14 अक्टूबर 2026: जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया। अभियोजन ने इसे दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखने की दलील दी थी।
अदालत में दोषियों का पक्ष: सजा सुनाने से पहले दोनों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया और अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं कहना है।
पुलिस और अभियोजन की टीम की रही अहम भूमिका
मामले की विवेचना और अभियोजन से जुड़े कार्यों में तत्कालीन एसएसपी डॉ. विपिन ताडा, एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह, विवेचक आरके पचौरी, थाने के पैरोकार दिलशाद अहमद और शिवकुमार सिंह की भूमिका बताई गई।
वहीं, जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) कृष्ण कुमार चौबे और सौरभ की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने अदालत में मुकदमे की कार्रवाई को आगे बढ़ाया। पुलिस की जांच में जुटाए गए साक्ष्यों को न्यायालय में प्रस्तुत करना, गवाहों की पेशी और मामले से जुड़े तथ्यों को क्रमवार रखना अभियोजन की प्रक्रिया का हिस्सा रहा।
64 दिन की प्रक्रिया और फैसले तक पहुंचने का सवाल
इस मामले में 64 दिन की न्यायिक प्रक्रिया और 22 गवाहों का उल्लेख यह बताता है कि जांच से अदालत तक पहुंचने में साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़ना कितना महत्वपूर्ण था। लेकिन फैसले तक पहुंचने की पूरी कहानी समझने के लिए जांच, आरोपपत्र, गवाहों की गवाही, जिरह, अभियोजन की अंतिम दलीलों और अदालत के निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
