us iran war: अमेरिका और ईरान के बीच जंग रोकने की कोशिशें एक बार फिर अटकती दिख रही हैं. कतर दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खोलने में जुटा है. लेकिन दोनों की शर्तों में इतना बड़ा फर्क है कि फिलहाल किसी ठोस समझौते के आसार नहीं दिख रहे. 28 सितंबर को अमेरिका और ईरान के अधिकारियों ने कतर के मीडिएटर्स के साथ अलग-अलग मीटिंग्स कीं. कई घंटे तक बातचीत चली और दोनों पक्षों की मांगों के बीच रास्ता निकालने के लिए एक प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई. लेकिन कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी.
us iran war: बातचीत में क्या पेच?
ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगाए गए सैंक्शन और समुद्री नाकेबंदी को कम करे. खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच बड़ा विवाद है. ईरान आर्थिक नाकेबंदी को हटाने और अपने फ्रीज किए गए फंड को रिलीज करवाना चाहता है.
दूसरी तरफ अमेरिका की सबसे बड़ी मांग ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर है. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप लगातार कह रहे हैं कि ईरान को न्यूक्लियर हथियार हासिल करने से रोकना जंग का मुख्य मकसद है. ईरान का कहना है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन दबाव या जबरदस्ती स्वीकार नहीं करेगा.
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कतर कर रहा मध्यस्थता की कोशिश
28 सितंबर को कतर के मीडिएटर्स ने दोनों पक्षों से अलग-अलग बातचीत की. कतर के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वो अमेरिका और ईरान के बीच लगातार संदेश पहुंचा रहा है और दोनों के बीच ऐसा साझा आधार तलाशने की कोशिश कर रहा है, जिससे कोई समझौता हो सके. इसके बाद बातचीत को लेकर उम्मीदें कुछ बढ़ी थीं. मीडिया रिपोर्ट्स में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि अगर ईरान न्यूक्लियर मुद्दे पर ठोस कदम उठाता है, तो अमेरिका सैंक्शंस में राहत और फ्रीज किए गए ईरानी फंड को लेकर रियायतों पर विचार कर सकता है. लेकिन ट्रंप ने इन रिपोर्ट्स को खारिज कर दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि उन्होंने ईरान को कुछ भी ऑफर नहीं किया है.
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29 सितंबर को ट्रंप ने भी अपना रुख साफ किया. उन्होंने कहा कि ईरान बहुत खराब स्थिति में है और उन्हें नहीं पता कि ईरान अभी हार मानने के लिए तैयार है या नहीं. साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान आखिरकार हार मानेगा और जंग का मकसद उसे न्यूक्लियर हथियार हासिल करने से रोकना है.
इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी
इन सबके बीच इराक से भी बड़ा अपडेट आया है. अमेरिकी सैनिकों ने इराक में अपने बचे हुए आखिरी सैन्य ठिकानों से भी वापसी पूरी कर ली है. इसके साथ इराक में अमेरिका की करीब 23 साल लंबी सैन्य मौजूदगी खत्म हो गई. ये वापसी 2024 में हुए एक समझौते के तहत हुई है और इसे डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने पूरा किया है. ईरान और उसके सहयोगियों ने इस वापसी को अपने लिए एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है. वहीं इराक में कुछ सुरक्षा अधिकारियों और एक्सपर्ट ने चिंता जताई है कि अमेरिकी सैनिकों की गैरमौजूदगी से ईरान समर्थित मिलिशिया को ज्यादा प्रभाव मिल सकता है और इस्लामिक स्टेट के फिर से सक्रिय होने का खतरा बढ़ सकता है.
इसी बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी IRGC ने अमेरिकी लोगों से ट्रंप के सहयोगी सांसदों को चुनाव में हराने की अपील की है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, IRGC ने 26 पन्नों की एक चिट्ठी जारी की है. इसमें अमेरिकी वोटर्स से युद्ध और विदेशों में अमेरिकी सैन्य दखल का विरोध करने की अपील की गई है. यानी एक तरफ कतर बातचीत के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच समझौते का रास्ता तलाश रहा है, तो दूसरी तरफ जमीन पर तनाव और आर्थिक दबाव दोनों बने हुए हैं. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों देश अपनी शर्तों में कुछ बदलाव कर किसी समझौते तक पहुंच पाएंगे, या फिर बातचीत के साथ-साथ जंग भी जारी रहेगी. जो भी अपडेट होगी, हम आप तक लेकर आएंगे.
