Neha Singh Rathore tweet on UGC: भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समानता नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को अस्थायी रोक लगा दी है, जिससे शिक्षा और राजनीति दोनों में तीखी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नियमों की भाषा अस्पष्ट और संभावित ‘दुरुपयोग’ के खतरों से भरी है, इसलिए 2026 के नए UGC रेग्युलेशन्स को लागू होने से रोका गया है। (Neha Singh Rathore tweet on UGC) इसका अर्थ है कि फिलहाल, 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे जब तक कि विस्तृत रूप से समीक्षा और संशोधन नहीं हो जाता।
Neha Singh Rathore tweet on UGC: नेहा सिंह राठौर का ट्वीट
इस फैसले के सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग रुख ले रही हैं। इस बीच UGC नियमों पर विवाद को लेकर लोक कलाकार और चर्चित व्यक्तित्व नेहा सिंह राठौर ने भी ट्वीट किया है। (Neha Singh Rathore tweet on UGC) उन्होंने ने अपने पोस्ट में लिखा “माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नए UGC नियमों पर रोक लगा दी है… उन्हें यह राहत उनके पॉपॉ ने नहीं दी है।” बाँटो और राज करो” का जो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया था, आज़ाद भारत में वही खेल भाजपा खेल रही है. ये अपने ही नागरिकों को कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर आपस में लड़वा रही है”
उनके इस तंज भरे ट्वीट ने फिर से एक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब कुछ वर्ग फिर से अपने पुराने समर्थकों और राजनीतिक संरक्षक-“पॉपॉ” को सम्मान देने की स्थिति में हैं?
- Advertisement -
UGC नियम पर विवाद क्यों ?
UGC द्वारा जनवरी 2026 में जारी किए गए “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” के अंतर्गत उच्च शिक्षा संस्थानों में समान मौका और जाति-आधारित भेदभाव से लड़ने के लिए कई कड़े प्रावधान शामिल किए गए थे। इनमें शिकायत निवारण प्रक्रिया, इक्विटी कमेटियां, और संभावित दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान थे।
लेकिन कई छात्र, संगठनों और नेताओं ने इसे “समाज को बाँटने वाला” बताया, जिसमें नेहा सिंह राठौर का तर्क था कि “ये नियम सामान्य (सवर्ण) वर्ग के छात्रों के साथ अन्याय कर सकते हैं और भेदभाव के दत्तक आरोपों से दुरुपयोग की स्थितियाँ पैदा कर सकते हैं। (Neha Singh Rathore tweet on UGC) ” सुप्रीम कोर्ट ने भी संविधान की भावना और अस्पष्टता से होने वाले संभावित दुरुपयोग पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि ऐसे व्यापक नियम बिना व्यापक शोध और स्पष्ट रूप से परिभाषित सिद्धांतों के लागू नहीं होने चाहिए।
“बाँटो और राज करो” की वापसी?
जैसे ही कोर्ट ने रोक लगाई, सोशल मीडिया और सियासी गलियारों में यह बहस तेज़ हो गई कि क्या सरकार और कुछ राजनीतिक समूह धार्मिक और जातीय विभाजनों को हवा दे रहे हैं “बाँटो और राज करो” की वही पुरानी रणनीति – ताकि सामाजिक तनाव को ‘सत्ता’ राजनीति में बदला जा सके।
कुछ समर्थक इसे ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली नीति के खिलाफ बताते हैं, जबकि विरोधी इसे समाज में पुरानी विभाजनों को फिर से उभारने की कोशिश मानते हैं। (Neha Singh Rathore tweet on UGC) इस बहस ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या उच्च शिक्षा में संवैधानिक समानता की रक्षा और सवर्णों की “सुरक्षा” को बराबरी से संतुलित किया जा सकता है या नहीं।
क्या अब मामला थमा या आगे बढ़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट की रोक फिलहाल विवाद को शांत करने के बजाय नई बहस को हवा दे रही है:
- सवर्ण समुदाय के लिए यह प्रतिबंध अस्थायी राहत जैसा प्रतीत हो रहा है।
- वंचित और पिछड़े वर्ग के लिए* चिंता यह है कि समानता के लिए बनाए नियमों का मूल लक्ष्य खो न जाए।
- नेहा सिंह राठौर जैसे सोशल मीडिया प्रभावक के ट्वीट से यह स्पष्ट हुआ है कि यह मुद्दा केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।
अब 19 मार्च 2026 की अगली सुनवाई में कोर्ट के आगे क्या फैसला आता है, (Neha Singh Rathore tweet on UGC) यह तय करेगा कि भारत की उच्च शिक्षा नीति संविधान की समानता की नींव पर मजबूत रहेगी या फिर विभाजन की राजनीति का हिस्सा बनकर रह जाएगी।
