Jagannath Rath Yatra Ka Itihas: ओडिशा के पावन क्षेत्र पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा सनातन धर्म के सबसे प्राचीन, भव्य और अनूठे उत्सवों में से एक है। हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को महाप्रभु जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यह महायात्रा केवल आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा इतिहास, समृद्ध पौराणिक कथाएँ और अद्भुत सूक्ष्म विज्ञान छिपा हुआ है।
Jagannath Rath Yatra Ka Itihas: रथ यात्रा का गौरवशाली इतिहास और पौराणिक मान्यताएँ
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पुरी की इस पावन रथ यात्रा का इतिहास सदियों पुराना है, जिसके प्रमाण हमारे प्राचीनतम ग्रंथों में सुरक्षित हैं:
प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख: स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और कपिला संहिता में इस दिव्य रथ यात्रा का विस्तृत और महिमामयी वर्णन मिलता है।
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ऐतिहासिक प्रमाण: पुरी के वर्तमान मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में कलिंग राजा चोडगंग देव ने प्रारंभ करवाया था, जिसे राजा अनंगभीम देव ने पूर्ण किया। मंदिर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड ‘मदला पांजी’ के अनुसार, मंदिर निर्माण से सदियों पहले से यह रथ यात्रा अनवरत आयोजित होती आ रही है।
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यात्रा के पीछे की प्रमुख कथाएँ:
मौसी के घर गमन: माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा की मौसी का घर ‘गुंडीचा मंदिर’ है। तीनों भाई-बहन हर साल 9 दिनों के लिए यहाँ विश्राम करने और अपनी मौसी के हाथ के बने ‘पोड़ा पीठा’ (चावल और गुड़ से बना विशेष व्यंजन) का आनंद लेने आते हैं।
बहन सुभद्रा की इच्छा: एक कथा के अनुसार, माता सुभद्रा ने एक बार द्वारका नगरी देखने की इच्छा प्रकट की थी। तब भगवान कृष्ण और बलराम ने उन्हें भव्य रथ पर बिठाकर पूरा नगर घुमाया था। उसी स्मृति में हर साल यह नगर भ्रमण कराया जाता है।
‘छेरा पहरा’: समरसता और समानता का अनुपम संदेश
रथ यात्रा की सबसे सुंदर और अद्वितीय परंपरा ‘छेरा पहरा’ है। जब तीनों विशाल रथ सज-धजकर तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (वहाँ के राजा) पारंपरिक पोशाक में पालकी से आते हैं। वे भगवान के समक्ष एक साधारण सेवक की भांति सोने की झाड़ू से रथ के मंडप को साफ करते हैं और चंदन का सुवासित जल छिड़कते हैं। यह रस्म दुनिया को यह महान संदेश देती है कि जगत के स्वामी महाप्रभु जगन्नाथ के सामने राजा हो या रंक, हर कोई मात्र एक सेवक है। यहाँ जाति, वर्ग या पद का कोई अहंकार नहीं टिकता।
भगवान के तीनों रथों का अद्वितीय एवं सूक्ष्म विवरण
रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये विशाल रथ हर साल नीम के पवित्र पेड़ों (दारु ब्रह्म) की लकड़ियों से नए सिरे से बनाए जाते हैं। इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के लोहे, कील या धातु के जोड़ों का उपयोग नहीं होता।
शास्त्रों और परंपरा के अनुसार तीनों रथों का सूक्ष्म, संख्यात्मक और आध्यात्मिक विवरण इस प्रकार है:
भगवान जगन्नाथ जी का रथ (नंदीघोष)
महाप्रभु जगन्नाथ का रथ सबसे विशाल और आकर्षण का केंद्र होता है।
रथ का नाम: नंदीघोष (इसे गरुड़ध्वज या कपिध्वज भी कहा जाता है)
कुल काष्ठ (लकड़ी के टुकड़ों) की संख्या: 832
कुल चक्के (पहिए): 16 (यह मानव चेतना और कलाओं के प्रतीक हैं)
रथ की ऊँचाई: 45 फीट
रथ की लम्बाई व चौड़ाई: 34 फीट 6 इंच
सारथि: दारुक
रथ के रक्षक: पक्षीराज गरुड़
रस्से का नाम: शंखचूड़ नागुनी (जिस पवित्र रस्सी से रथ खींचा जाता है)
पताका (ध्वज) का नाम व रंग: त्रैलोक्य मोहिनी (लाल और पीले रंग का वस्त्र)
रथ के मुख्य 4 घोड़े: शंख, बलाहक, श्वेता और हरिद्वाश।
पार्श्व देवी-देवता (रथ पर रक्षक रूप में विराजमान): रथ पर वराह, गोवर्धन, कृष्णा, गोपीकृष्ण, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रुद्र जैसे देव-स्वरूपों की आकृतियां रक्षक के रूप में पूजी जाती हैं।
भइया बलदेव (बलराम) जी का रथ (तालध्वज)
भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र जी का रथ उनके शौर्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
रथ का नाम: तालध्वज
कुल काष्ठ (लकड़ी के टुकड़ों) की संख्या: 763
कुल चक्के (पहिए): 14
रथ की ऊँचाई: 44 फीट
रथ की लम्बाई व चौड़ाई: 33 फीट
सारथि: मातली
रथ के रक्षक: भगवान वासुदेव
रस्से का नाम: बासुकी नाग
पताका (ध्वज) का नाम व रंग: उन्मयी/उन्नानी (लाल और हरे रंग का वस्त्र)
रथ के 4 मुख्य घोड़े: तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ।
माता सुभद्रा जी का रथ (देवदलन)
भगवान जगन्नाथ की लाडली बहन माता सुभद्रा का रथ दोनों भाइयों के रथों के मध्य में चलता है।
रथ का नाम: देवदलन (इसे दर्पदलन या पद्मध्वज भी कहा जाता है)
कुल काष्ठ (लकड़ी के टुकड़ों) की संख्या: 593
कुल चक्के (पहिए): 12
रथ की ऊँचाई: 43 फीट
रथ की लम्बाई व चौड़ाई: 31 फीट 6 इंच
सारथि: अर्जुन
रथ की रक्षक: माता जयदुर्गा
रस्से का नाम: स्वर्णचूड़ नागुनी
पताका (ध्वज) का नाम व रंग: नदाम्बिका (लाल और काले/गहरे कत्थई रंग का वस्त्र)
रथ के मुख्य घोड़े: रुचिका और मोचिक (मुख्य रूप से चार घोड़े खींचते हैं)।
- आध्यात्मिक महत्व और मोक्ष की प्राप्ति
सनातन संस्कृति में पुरी को ‘मर्त्य वैकुंठ’ यानी धरती का वैकुंठ माना गया है। महाप्रभु जगन्नाथ को ‘पतितपावन’ कहा जाता है—यानी पतितों (पापियों और दीनों) का उद्धार करने वाले।
गर्भगृह से बाहर आना: जो भक्त किसी कारणवश मंदिर के भीतर नहीं जा पाते, उनके कल्याण के लिए महाप्रभु स्वयं चलकर गर्भगृह से बाहर राजमार्ग पर आते हैं। यहाँ जाति, धर्म या संप्रदाय का कोई बंधन नहीं होता; हर आंख उनके दर्शन पा सकती है।
रथ खींचने का पुण्य: स्कंद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जो मनुष्य रथ यात्रा के उत्सव में शामिल होकर भक्तिभाव से रथ के सामने नृत्य करता है, कीर्तन करता है या महाप्रभु के रथ की रस्सी को श्रद्धापूर्वक स्पर्श करके खींचता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। उसके करोड़पति जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
