CEC Gyanesh Kumar: देश की राजनीति में इन दिनों एक सवाल खूब चर्चा में है। क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाया जा सकता है? अगर राहुल गांधी और पूरा विपक्ष उनके खिलाफ खड़ा हो जाए तो क्या उनकी कुर्सी चली जाएगी? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें सीधे पद से हटा सकते हैं?
इन सवालों का जवाब जितना दिलचस्प है, उतना ही महत्वपूर्ण भी। क्योंकि भारत के संविधान ने मुख्य चुनाव आयुक्त को ऐसी सुरक्षा दी है कि केवल राजनीतिक विरोध, प्रदर्शन या सरकार की नाराजगी के आधार पर उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता। दरअसल, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव बढ़ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। दिल्ली में प्रदर्शन हो रहे हैं और विपक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। लेकिन सड़क पर इस्तीफा मांगना और संसद के जरिए किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। आइए समझते हैं कि संविधान क्या कहता है और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया कितनी कठिन है।
CEC Gyanesh Kumar: क्या प्रधानमंत्री ज्ञानेश कुमार को हटा सकते हैं?
इसका सीधा जवाब है नहीं। प्रधानमंत्री अपनी इच्छा से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटा सकते। यहां तक कि राष्ट्रपति भी बिना संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हुए उन्हें हटाने का आदेश नहीं दे सकते। इसकी वजह संविधान का अनुच्छेद 324(5) है। इसके मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। यानी मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी किसी सामान्य सरकारी अधिकारी जैसी नहीं है।
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इस व्यवस्था का उद्देश्य चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखना है, ताकि चुनाव कराने वाला संवैधानिक संस्थान सरकार या किसी राजनीतिक दल के दबाव में काम करने के लिए मजबूर न हो।
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सिर्फ आरोप लगाने से नहीं जाएगी कुर्सी, साबित करनी होगी गंभीर वजह
संविधान के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के दो आधार बताए गए हैं। पहला, साबित हुआ कदाचार यानी Proved Misbehaviour। दूसरा, अक्षमता यानी Incapacity। मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में भी यही संवैधानिक मानक लागू होता है। इसका मतलब है कि किसी राजनीतिक दल का यह कहना कि मुख्य चुनाव आयुक्त पक्षपात कर रहे हैं, अपने आप में उन्हें हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपों की जांच और निर्धारित संसदीय प्रक्रिया जरूरी होती है।
यही वजह है कि राहुल गांधी या विपक्षी दलों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों और कानूनी रूप से साबित कदाचार के बीच फर्क समझना जरूरी है। चुनाव आयोग और BJP ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण में राजनीतिक पक्षपात के आरोपों से इनकार किया है।
पहला कदम: कम से कम 100 लोकसभा या 50 राज्यसभा सांसद चाहिए
अब सवाल है कि अगर विपक्ष वास्तव में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू करना चाहे तो उसे क्या करना होगा? न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत लागू प्रक्रिया में प्रस्ताव की शुरुआत के लिए सांसदों के निर्धारित समर्थन की जरूरत होती है। लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए। वहीं राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि 100 या 50 सांसदों के हस्ताक्षर होते ही मुख्य चुनाव आयुक्त हट जाएंगे। यह केवल प्रक्रिया शुरू करने की पहली शर्त है। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को प्रस्ताव स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार होता है।
दूसरा कदम: तीन सदस्यीय कमेटी करेगी आरोपों की जांच
अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को शामिल किया जाता है। समिति आरोपों की जांच करती है। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और बचाव का अवसर भी मिलता है। अगर समिति आरोप साबित नहीं पाती, तो हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। लेकिन अगर समिति आरोपों को सही पाती है, तब मामला संसद में मतदान के चरण तक पहुंच सकता है। यानी केवल राजनीतिक संख्या नहीं, आरोपों का कानूनी परीक्षण भी जरूरी है।
तीसरा कदम: संसद में चाहिए साधारण नहीं, विशेष बहुमत
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया का सबसे कठिन हिस्सा संसद में विशेष बहुमत हासिल करना है। प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में अलग-अलग पारित होना जरूरी है। इसके लिए दो शर्तें एक साथ पूरी करनी होती हैं। पहली, सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन। दूसरी, मतदान में उपस्थित और वोट देने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई का समर्थन।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 है। ऐसी स्थिति में कुल सदस्य संख्या के आधार पर कम से कम 272 सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा। लेकिन अगर सभी 543 सदस्य मतदान में हिस्सा लेते हैं तो दो-तिहाई की शर्त पूरी करने के लिए कम से कम 362 वोट चाहिए होंगे। (CEC Gyanesh Kumar) इसलिए 272 वोट मिल जाना हर स्थिति में पर्याप्त नहीं होगा। दोनों संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होंगी। राज्यसभा में भी यही नियम लागू होगा। दोनों सदनों से निर्धारित बहुमत मिलने के बाद ही राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं।
क्या विपक्ष अपने दम पर ज्ञानेश कुमार को हटा सकता है?
यहीं से मामला राजनीतिक रूप से दिलचस्प हो जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विपक्ष को केवल प्रस्ताव पेश करने लायक सांसद नहीं, बल्कि दोनों सदनों में विशेष बहुमत जुटाना होगा। (CEC Gyanesh Kumar) इस प्रक्रिया में सत्तापक्ष के सांसदों का समर्थन भी निर्णायक हो सकता है। अगर किसी एक सदन में आवश्यक बहुमत नहीं मिलता तो हटाने की प्रक्रिया सफल नहीं होगी।
यही कारण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक व्यवस्था बेहद कठिन मानी जाती है। हालांकि कठिन प्रक्रिया का अर्थ यह नहीं कि मुख्य चुनाव आयुक्त जवाबदेही से बाहर हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि उन्हें हटाने के लिए निर्धारित संवैधानिक मानक पूरे करने होंगे।
इस्तीफा और पद से हटाना, दोनों में बड़ा अंतर
इस विवाद में एक और महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है। इस्तीफा देना मुख्य चुनाव आयुक्त का अपना फैसला हो सकता है, लेकिन उन्हें जबरन पद से हटाने के लिए संविधान की प्रक्रिया जरूरी है। अगर ज्ञानेश कुमार स्वयं इस्तीफा देने का निर्णय लेते हैं तो उन्हें संसद में विशेष बहुमत से हटाने की प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी।
लेकिन अगर वह इस्तीफा नहीं देते और विपक्ष उन्हें पद से हटाना चाहता है, तो केवल धरना-प्रदर्शन या राजनीतिक प्रस्ताव पर्याप्त नहीं होगा। संसदीय और संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होंगी।
क्या दूसरे चुनाव आयुक्तों को भी इसी तरह हटाया जाता है?
नहीं… यहां भी संविधान में एक महत्वपूर्ण अंतर है। मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा मिली हुई है। लेकिन अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दोनों के लिए अलग व्यवस्था दी गई है। इस अंतर का उद्देश्य चुनाव आयोग के भीतर संस्थागत स्वतंत्रता और पदों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
आखिर संविधान ने इतनी मजबूत सुरक्षा क्यों दी?
इस सवाल का जवाब भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में छिपा है। देश में लोकसभा, विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से जुड़े चुनावों के संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग के पास है। अगर किसी सरकार को यह अधिकार मिल जाए कि वह अपनी नाराजगी के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत हटा सके, तो आयोग की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसी खतरे से बचाने के लिए संविधान निर्माताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को विशेष सुरक्षा दी। हालांकि इस सुरक्षा के साथ निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन करने की अपेक्षा भी जुड़ी हुई है।
राहुल गांधी की मांग के बाद अब आगे क्या?
राहुल गांधी और INDIA गठबंधन की मांग फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली ने मतदाता सूची की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग और BJP इन आरोपों से असहमत हैं।ऐसे में आगे दो अलग रास्ते हो सकते हैं। पहला, मुख्य चुनाव आयुक्त स्वयं इस्तीफा देने का निर्णय लें।
दूसरा, उन्हें हटाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जाए, जिसमें आरोपों की जांच और संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होगा। सौ बात की एक बात यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी केवल राजनीतिक नारों या विरोध-प्रदर्शन से नहीं जाती। इसके लिए संविधान ने एक लंबी और कठिन प्रक्रिया तय की है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राहुल गांधी और विपक्ष ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष इस मांग को संवैधानिक प्रक्रिया तक ले जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो संसद में जरूरी समर्थन कहां से आएगा?
