US-IRAN war: ईरान के साथ जारी तनाव और जंग जैसे हालात के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका अब केवल अपनी सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से मोर्चे पर भी नई चाल चलता दिखाई दे रहा है। सामान्यतः अभी तक यह माना जाता रहा है कि अमेरिका युद्ध के दौरान हथियारों की बिक्री से बड़ा मुनाफा कमाता है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ बदली हुई सी नज़र आ रही है। ट्रंप प्रशासन अब खाड़ी देशों के पुनर्निर्माण को कमाई के बड़े मौके के रूप में देख रहा है।
US-IRAN war: अमेरिका इन खाड़ी देशों को दिया बड़ा संकेत
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों को यह बड़ा संकेत दे दिया है कि वे ईरानी हमलों से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिकी कंपनियों की सेवाएं लें। (US-IRAN war) विशेष तौर पर इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों को आगे लाने की रणनीति पर कार्य किया जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह कदम “अमेरिका फर्स्ट” नीति के अंतर्गत उठाया जा रहा है।
दरअसल, ईरान के जवाबी हमलों में खाड़ी क्षेत्र को बड़ा नुकसान हुआ है। ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को सबसे अधिक झटका लगा है। (US-IRAN war) शुरुआती आकलन के अनुसार, सिर्फ मरम्मत और पुनर्निर्माण पर ही लगभग 39 अरब डॉलर तक का खर्च आ सकता है। ऐसे में यह पूरा प्रोजेक्ट अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़े बिजनेस मौके के रूप में देखा जा रहा है।
- Advertisement -
खाड़ी देशों में मिली-जुली प्रतिक्रिया
हालांकि, इस रणनीति को लेकर खाड़ी देशों में मिली-जुली प्रतिक्रिया ही सामने आयी है। (US-IRAN war) कुछ अरब मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों को ऐसा लगता है कि युद्ध जैसे संवेदनशील वक़्त में इस तरह का आर्थिक रूप से दबाव बनाना “असंवेदनशील” कदम हो सकता है। उनका मानना है कि अभी प्राथमिकता स्थिरता और सुरक्षा होनी चाहिए, न कि व्यावसायिक फायदा।
Also Read –Banda News: बांदा सर्राफा हत्याकांड: पुलिस मुठभेड़ में आरोपी गिरफ्तार, दोनों पैरों में लगी गोली
युद्ध में कुवैत को पहुंचा भयंकर नुकसान
यदि नुकसान की बात करें तो कुवैत को इस युद्ध में भयंकर रूप से क्षति पहुंची है। यहां एयरबेस, एयरपोर्ट और पावर प्लांट्स को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा है। (US-IRAN war) अमेरिकी सेना के महत्वपूर्ण ठिकाने – कैंप आरिफजान और अली अल-सलेम एयरबेस आदि भी हमलों का निशाना बने। इसके अलावा कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट और कई पानी के डिसैलिनेशन प्लांट भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिससे देश में ऊर्जा और पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है।
वहीं बहरीन की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। यह छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश है, जहां अमेरिकी नौसेना का फिफ्थ फ्लीट तैनात है। (US-IRAN war) ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने यहां के पोर्ट, रिफाइनरी और इंडस्ट्रियल साइट्स को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। इससे देश की आर्थिक गतिविधियां और लॉजिस्टिक्स सिस्टम भी गंभीर तरह प्रभावित हुए हैं।
ध्यान दिया जाए तो… हमलों का प्रभाव केवल पारंपरिक ढांचे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टेक और इंडस्ट्री सेक्टर भी इसकी चपेट में आए हैं। क्लाउड सर्विस और बड़े इंडस्ट्रियल प्लांट्स को नुकसान की खबरें सामने आई हैं, जिससे उत्पादन और सप्लाई चेन पर प्रभाव पड़ा है।
क्या है अमेरिका की योजना ?
इस बीच अमेरिका की योजना केवल सुझाव देने तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि यदि खाड़ी देश अमेरिका से वित्तीय सहयोग या डॉलर सपोर्ट चाहते हैं, तो बदले में उन्हें अमेरिकी कंपनियों को ठेके देने पड़ सकते हैं। (US-IRAN war) यानी यह एक तरह का “ट्रेड-ऑफ मॉडल” हो सकता है, जिसमें आर्थिक रूप से सहायता के बदले बिजनेस मौके सुनिश्चित किए जाएंगे।
हालांकि, खाड़ी देशों के पास खुद भी मजबूत आर्थिक संसाधन हैं। उदाहरण के लिए, कुवैत का सॉवरेन वेल्थ फंड लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का माना जाता है। इसके बावजूद, मौजूदा अनिश्चित माहौल, तेल निर्यात पर पड़ रहे प्रभाव और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए ये देश सतर्क रणनीति अपनाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिका ने पेश किया नया आर्थिक मॉडल
कुल मिलाकर, जंग के इस दौर में अमेरिका ने एक नया आर्थिक मॉडल पेश कर दिया है, जिसमें युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण को कमाई के बड़े मौके में बदला जा रहा है। अब देखना यह होगा कि खाड़ी देश इस प्रस्ताव को किस हद तक स्वीकार करते हैं और इससे क्षेत्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है।
