UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों हलचल तेज है और इस हलचल के केंद्र में हैं पंकज चौधरी। भारतीय जनता पार्टी के हालिया फैसलों ने एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि पार्टी अपने राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए चौंकाने वाले कदम उठाने से पीछे नहीं हटती। प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सौंपे जाने के बाद अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या पंकज चौधरी के हाथ से केंद्रीय मंत्री का पद भी फिसल सकता है।
दरअसल, बिहार में नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद शुरू हुई सियासी उथल-पुथल का असर अब राष्ट्रीय स्तर पर दिखने लगा है। दिल्ली की सत्ता के गलियारों में केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की चर्चाएं ज़ोर पकड़ रही हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर भी समीकरणों का पुनर्गठन तय माना जा रहा है, और इसी फेरबदल की आंच पंकज चौधरी तक पहुंचती दिख रही है। (UP Politics) भाजपा की रणनीति को समझें तो यह साफ होता है कि पार्टी ‘दोनों हाथों में लड्डू’ वाली स्थिति कम ही बनाती है। संगठन और सरकार दोनों में एक साथ बड़ी जिम्मेदारी देना अपवाद माना जाता है, लेकिन जब राजनीतिक आवश्यकता हो, तो पार्टी अपने ही नियमों को लचीला भी बना लेती है। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना भी इसी रणनीतिक लचीलेपन का हिस्सा माना जा रहा है। अब पंकज का केंद्रीय मंत्री का पद संकट में है।
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UP Politics: महेंद्र नाथ पांडेय को भी मिली थी दो जिम्मेदारी
भाजपा के इतिहास पर नजर डालें तो महेंद्र नाथ पांडेय इसका प्रमुख उदाहरण हैं। वर्ष 2017 में जब उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, तब वे केंद्र में मंत्री भी थे और उन्होंने दोनों जिम्मेदारियां एक साथ निभाईं। (UP Politics) उस समय पार्टी को अगड़ी जातियों विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की जरूरत थी, क्योंकि योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद आगड़ी जातियों के कुछ वर्गों का संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही थी। भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष पद ब्राह्मण चेहरे को देकर इस असंतुलन को साधने की कोशिश की थी।
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भाजपा के लिए पंकज क्यों जरूरी
अब 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा एक बार फिर नए सामाजिक समीकरण गढ़ने में जुटी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने के बाद पार्टी आत्ममंथन की स्थिति में है। (UP Politics) ऐसे में पंकज चौधरी का चयन केवल संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पंकज चौधरी कुर्मी समुदाय से आते हैं, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है। (UP Politics) माना जा रहा है कि यह कदम अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) रणनीति का जवाब है। भाजपा इस फैसले के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ नए सामाजिक वर्गों में भी पैठ मजबूत करना चाहती है।
जहां तक पंकज चौधरी के केंद्रीय मंत्री पद का सवाल है, तो यह पूरी तरह भाजपा के राजनीतिक गणित पर निर्भर करेगा। अगर पार्टी को लगे कि संगठन में उनकी भूमिका अधिक अहम है, तो संभव है कि मंत्री पद की जिम्मेदारी उनसे वापस ले ली जाए। वहीं, यदि पार्टी दोहरी जिम्मेदारी को चुनावी दृष्टि से लाभकारी मानती है, तो वे दोनों पदों पर बने भी रह सकते हैं। (UP Politics) कुल मिलाकर, भाजपा का यह दांव केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए बिछाई जा रही एक बड़ी राजनीतिक बिसात का हिस्सा है, जहां हर मोहरा सोच-समझकर आगे बढ़ाया जा रहा है।
पंकज चौधरी की कहां से शुरू हुई सियासत
पंकज चौधरी ने साल 1989 में गोरखपुर नगर निगम के पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। साल 1990 में बीजेपी की ज़िला कार्य समिति के सदस्य बने और उसी साल उप महापौर भी बन गए थे। (UP Politics) साल 1991 में महाराजगंज लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुने गए। इसके बाद 1996 और 1998 में फिर संसद पहुंचे। साल 1999 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने 2004 में वापसी की और सांसद चुने गए। साल 2009 में एक बार फिर उन्हें पराजय मिली, मगर 2014 से वे लगातार लोकसभा के लिए निर्वाचित होते आ रहे हैं।
