Osman Hadi Violence Update: बांग्लादेश की गलियां आज खून से लाल हैं और आसमान धुएं के काले गुबार से ढका हुआ है। जो देश कल तक लोकतंत्र की नई इबारत लिखने का ख्वाब देख रहा था, आज वहां मौत का तांडव नाच रहा है। हिंसा की आग इस कदर भड़क चुकी है कि अब न कानून का डर बचा है और न ही इंसानियत की फिक्र। इस कोहराम के बीच जो सबसे डरावनी तस्वीर सामने आई है, वह है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया पर जानलेवा हमला। (Osman Hadi Violence Update) ढाका की सड़कों पर जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया है। पत्रकारों ने भागकर अपनी जान बचाई और दशकों पुराने अखबारों के दफ्तर राख के ढेर में तब्दील हो गए। क्या बांग्लादेश एक ऐसे अंधेरे की ओर बढ़ रहा है जहां से वापसी मुमकिन नहीं? आइए जानते हैं उस काली रात की पूरी कहानी, जिसने एक झटके में पूरे देश को हिलाकर रख दिया।
Osman Hadi Violence Update: जब दफ्तरों को बनाया श्मशान
बुधवार की वो काली रात ढाका के पत्रकारों के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। ‘प्रोथोम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ जैसे बड़े अखबारों के दफ्तरों में पत्रकार रोज की तरह अगली सुबह की सुर्खियां तैयार कर रहे थे। (Osman Hadi Violence Update) किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल वे खुद मौत की खबर बनने वाले हैं। अचानक सैकड़ों की तादाद में उग्र प्रदर्शनकारियों की भीड़ नारेबाजी करती हुई इमारतों की तरफ बढ़ी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के हाथों में मशालें और पेट्रोल बम थे। पलक झपकते ही इमारतों में आग लगा दी गई। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और जान बचाने की जद्दोजहद शुरू हुई। पत्रकारों को अपनी कलम और कैमरा छोड़कर खिड़कियों और पिछले दरवाजों से भागना पड़ा। कार्यकारी संपादक सज्जाद शरीफ ने भारी मन से इसे बांग्लादेशी मीडिया के इतिहास की सबसे काली रात करार दिया है।
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27 साल का इतिहास राख, पहली बार नहीं छप सका अखबार
यह हमला सिर्फ ईंट और पत्थर पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी पर एक सीधा प्रहार था। 1998 में अपनी स्थापना के बाद से ‘प्रोथोम आलो’ ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन 27 सालों में यह पहला मौका है जब यह अखबार प्रकाशित नहीं हो सका। (Osman Hadi Violence Update) जिस प्रेस से हर सुबह उम्मीद की खबरें निकलती थीं, वहां आज सन्नाटा और धुंआ है। अखबार की वेबसाइट भी बंद कर दी गई है। यह केवल एक मीडिया हाउस की हार नहीं है, बल्कि उस जनता की हार है जो सच जानने का हक रखती है। समाज का गुस्सा इस कदर बेकाबू हो गया कि उन्होंने उन लोगों को निशाना बनाया जो उनकी आवाज उठाते थे। आज बांग्लादेश का मीडिया जगत सदमे में है और हर पत्रकार के मन में बस एक ही सवाल है—क्या हम अब सुरक्षित हैं?
कौन था वो युवा नेता जिसकी मौत ने पूरे देश में लगा दी आग?
इस भयंकर हिंसा की चिंगारी 32 वर्षीय युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या से भड़की। हादी कोई आम चेहरा नहीं थे, बल्कि वह ‘इंकलाब मंच’ के संयोजक और लाखों युवाओं की उम्मीद थे। ढाका विश्वविद्यालय के इस पूर्व छात्र ने राजनीति के पुराने और सड़े-गले ढर्रे को चुनौती दी थी। वह न केवल सत्तारूढ़ अवामी लीग के विरोधी थे, बल्कि हर उस व्यवस्था के खिलाफ थे जो जनता का दमन करती थी। 12 दिसंबर को जब वह ढाका के मोटिजील इलाके में एक रिक्शा से जा रहे थे, तब नकाबपोश हमलावरों ने उनके सिर में गोली मार दी। (Osman Hadi Violence Update) सिंगापुर में छह दिनों तक मौत से लड़ने के बाद हादी ने दम तोड़ दिया। उनकी मौत की खबर जैसे ही ढाका पहुंची, युवाओं का आक्रोश ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा।
क्या चुनाव से पहले गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है बांग्लादेश?
शरीफ उस्मान हादी की हत्या और उसके बाद की हिंसा ने बांग्लादेश के भविष्य पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। देश में जल्द ही राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश की स्थिति नाजुक है। ऐसे समय में मीडिया पर हमले और सड़कों पर खूनखराबा यह संकेत दे रहा है कि हालात सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह हिंसा केवल एक नेता की मौत का बदला नहीं है, बल्कि देश के भीतर पनप रहे गहरे असंतोष का नतीजा है। अगर जल्द ही शांति बहाल नहीं हुई, तो बांग्लादेश एक बड़े गृहयुद्ध की आग में झुलस सकता है। आज ढाका की राख से उठने वाली चिंगारियां पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरे की घंटी हैं।
