Israel Election Result 2026: इज़रायल के संसदीय चुनाव में गुरुवार, 29 अक्टूबर की शाम तक मतगणना का प्रमुख चरण पूरा हो गया। लेकिन नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है। इज़रायल के आर्थिक समाचार पत्र ‘ग्लोब्स’ ने स्थानीय समयानुसार शाम 5:37 बजे तक अद्यतन अपनी रिपोर्ट में केंद्रीय चुनाव आयोग के हवाले से बताया कि सैनिकों, अस्पतालों में भर्ती लोगों तथा विशेष परिस्थितियों में मतदान करने वाले नागरिकों के दोहरे लिफाफे वाले मतपत्रों की गणना भी पूरी कर ली गई है। चुनाव आयोग को 12,644 मतदान केंद्रों से 55 लाख 89 हजार 836 मतों का विवरण प्राप्त हुआ है। इनमें 55 लाख 64 हजार 764 वैध और 25 हजार 72 अवैध मत दर्ज हैं। हालाँकि आयोग ने स्पष्ट किया है कि इन आँकड़ों की अंतिम जाँच बाकी है और आधिकारिक अंतिम परिणाम अगले बुधवार, 4 नवंबर को प्रकाशित किए जाएँगे।
Also Read –New Delhi: 80 की उम्र में भी 50 साल जैसा तेज दिमाग! वैज्ञानिकों ने खोजा सुपरएजर्स की याददाश्त का राज
इस गणना के अनुसार प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिल रही हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइज़नकोट की यशार पार्टी 21 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद के संयुक्त दल बेयाखाद को 12, अरब दलों के जॉइंट लिस्ट गठबंधन को 11, याइर गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी को आठ, मंसूर अब्बास की रा’अम पार्टी को आठ और अविगडोर लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनू को सात सीटें मिलने का अनुमान है। नेतन्याहू के सहयोगियों में इतामार बेन-गवीर की ओत्ज़मा येहुदित को सात, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म को सात, शास को छह तथा बेज़लेल स्मोट्रिच के धार्मिक ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत गठबंधन को छह सीटें मिल रही हैं।
दिन की गणना में एक उल्लेखनीय बदलाव अरब पार्टियों के बीच दिखाई दिया। पिछले दिन जॉइंट लिस्ट को 12 और रा’अम को सात सीटें मिलती दिखाई दे रही थीं। गुरुवार की गिनती में जॉइंट लिस्ट एक सीट घटकर 11 और रा’अम एक सीट बढ़कर आठ पर पहुँच गई। हालाँकि दोनों अरब दलों की कुल 19 सीटें बनी रहीं। इस तरह नेतन्याहू और उनके मौजूदा सहयोगी दलों की कुल संख्या 53, आइज़नकोट के नेतृत्व वाले चार विपक्षी दलों की संख्या 48 और अरब पार्टियों की संयुक्त संख्या 19 है। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है।
- Advertisement -
Israel Election Result 2026: नेतन्याहू समर्थकों की नई पहल : आइज़नकोट को आधे कार्यकाल का प्रधानमंत्री पद देने का प्रस्ताव
गुरुवार की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक खबर इज़रायल के समाचार पत्र ‘द जेरूसलम पोस्ट’ में प्रकाशित हुई। अख़बार की पत्रकार अन्ना बार्स्की ने नेतन्याहू के नजदीकी सूत्रों के हवाले से बताया कि प्रधानमंत्री के राजनीतिक खेमे में राष्ट्रीय एकता सरकार के नए प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है। इस प्रस्ताव के अनुसार नेतन्याहू की लिकुड और आइज़नकोट की यशार पार्टी मिलकर एक नई सरकार का आधार तैयार करेंगी। इसके लिए अति-रूढ़िवादी धार्मिक दलों को सरकार से बाहर रखने और प्रधानमंत्री पद का क्रमिक हस्तांतरण करने का विचार सामने आया है। यह नेतन्याहू के किसी औपचारिक प्रस्ताव की घोषणा नहीं है। बल्कि उनके नजदीकी राजनीतिक सूत्रों द्वारा समाचार माध्यमों को बताई गई योजना है।
इस संभावित व्यवस्था के तहत नेतन्याहू पहले लगभग दो वर्ष प्रधानमंत्री बने रहेंगे और उसके बाद गादी आइज़नकोट को प्रधानमंत्री पद सौंपा जा सकता है। नेतन्याहू के सहयोगियों का तर्क है कि वर्तमान प्रधानमंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शेष कार्यकाल के दौरान ईरान से संबंधित सुरक्षा नीति और क्षेत्रीय कूटनीतिक पहलों को आगे बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए। उसके बाद नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। हालाँकि आइज़नकोट पहले ही नेतन्याहू के अधीन या उनके साथ बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने वाली सरकार में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं। इसलिए प्रस्ताव पर उनकी सहमति नहीं मानी जा सकती।
यह पहल राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू ने मजबूत दक्षिणपंथी सरकार बनाने का वादा किया था। बुधवार को उन्होंने अपने सहयोगियों बेन-गवीर और स्मोट्रिच से बातचीत में भी साथ बने रहने का आश्वासन दिया था। इज़रायली चैनल 14 के अनुसार नेतन्याहू ने अपने सहयोगियों से कहा था, “हम साथ हैं और साथ ही रहेंगे।” अब उनके नजदीकी सूत्रों की ओर से ऐसी सरकार का विचार सामने आना, जिसमें कुछ पुराने सहयोगी बाहर हो सकते हैं, लिकुड के भीतर चल रही राजनीतिक संभावनाओं की पड़ताल को महत्वपूर्ण बनाता है। फिलहाल नेतन्याहू के सार्वजनिक रुख और उनके नजदीकी सूत्रों के प्रस्ताव को एक नहीं माना जा सकता।
लिबरमैन ने तीनों रास्तों पर खींची लाल रेखा, नेतन्याहू के बिना लिकुड से बातचीत को तैयार
गुरुवार को एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम पूर्व रक्षा मंत्री अविगडोर लिबरमैन के बयान के रूप में सामने आया। लिबरमैन ने अपनी यिस्राएल बेतेनू पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि वह प्रधानमंत्री नेतन्याहू, अरब नेता अहमद तिबी या अति-रूढ़िवादी धार्मिक दलों के साथ सरकार में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले जो प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की थीं, वे चुनाव के बाद भी कायम हैं। उन्होंने यहाँ तक स्पष्ट किया कि वह ऐसी सरकार में भी शामिल नहीं होंगे जो सीधे या परोक्ष रूप से अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर हो।
लिबरमैन ने इसके साथ एक नया राजनीतिक विकल्प भी सामने रखा है। उनके अनुसार ऐसी सरकार पर बातचीत हो सकती है जिसमें ज़ायनिस्ट दल शामिल हों।लेकिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री न हों। इसका अर्थ यह है कि वह नेतन्याहू के बिना लिकुड पार्टी के साथ भी सरकार बनाने के प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं। उन्होंने नई सरकार के लिए दो प्रमुख शर्तें रखीं—सात अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलता की सरकारी जाँच के लिए राज्य आयोग का गठन और सेना में भर्ती की समान व्यवस्था लागू करने वाला कानून। उनके अनुसार इन मुद्दों के बिना कोई गठबंधन उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगा।
इस बयान से गठबंधन वार्ताओं की कठिनाई साफ होती है। लिबरमैन की पार्टी के पास सात सीटें हैं। आइज़नकोट के विपक्षी खेमे की 48 सीटों में ये सात सीटें शामिल हैं। यदि लिबरमैन अरब दलों के समर्थन वाली सरकार से अलग रहते हैं तो शेष विपक्षी खेमे की संख्या 41 रह जाती है। उसे अरब दलों की 19 सीटों का पूरा समर्थन भी मिल जाए, तब कुल 60 सांसद होंगे। अर्थात उसके सामने एक और सांसद का समर्थन जुटाने की आवश्यकता होगी। दूसरी ओर लिबरमैन के नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने से इनकार के कारण लिकुड के लिए भी यह रास्ता बंद है, जब तक राजनीतिक नेतृत्व या समझौते की शर्तें नहीं बदलतीं।
गोलान और लापिद की मुलाकात, विपक्ष में साझा रणनीति बनाने का प्रयास
गुरुवार दोपहर इज़रायल के समाचार पत्र ‘ग्लोब्स’ ने पुष्टि की कि डेमोक्रेट्स पार्टी के अध्यक्ष याइर गोलान और पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिद की मुलाकात हुई है। दोनों नेताओं ने मुलाकात को आगामी राजनीतिक कदमों में तालमेल बनाने का प्रयास बताया। यह जानकारी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोलान पहले ही अरब पार्टियों की मदद से नेतन्याहू के स्थान पर नई सरकार बनाने के पक्ष में बयान दे चुके हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन के अन्य नेता इस प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं।
इस मुलाकात से यह पुष्टि होती है कि विपक्षी नेताओं के बीच संपर्क चल रहा है। हालाँकि गोलान और लापिद ने किसी संयुक्त सरकार का औपचारिक समझौता घोषित नहीं किया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि दोनों नेताओं के बीच अरब दलों के समर्थन, प्रधानमंत्री पद या संभावित राष्ट्रीय एकता सरकार के विषय में क्या अंतिम सहमति बनी। इसलिए इसे सरकार गठन की दिशा में राजनीतिक बातचीत माना जा सकता है, गठबंधन बन जाने की घटना नहीं।
पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइज़नकोट भी अपने सहयोगी दलों से संपर्क बनाए हुए हैं। उन्होंने बुधवार को कहा था कि वह ऐसी सरकार बनाने का प्रयास करेंगे जो राष्ट्रीय सेवा और सैन्य भर्ती के दायित्व को व्यापक रूप से लागू करे। उन्होंने चुनाव परिणामों को निवर्तमान सरकार में जनता के विश्वास की कमी के रूप में प्रस्तुत किया। दूसरी ओर नेतन्याहू ने अपने समर्थकों के सामने दक्षिणपंथी सरकार बनाने की बात कही है। दोनों नेताओं के सार्वजनिक रुख में अभी तक कोई निर्णायक बदलाव सामने नहीं आया है।
चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप का नया विवाद : शिन बेट की जाँच, कतर का कड़ा खंडन
गुरुवार की सबसे गंभीर घटनाओं में एक चुनाव में कथित विदेशी हस्तक्षेप की जाँच रही। इज़रायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट की ओर से प्राप्त जानकारी के आधार पर केंद्रीय चुनाव आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश नोआम सोलबर्ग ने कथित विदेशी धन और चुनाव को अनुचित ढंग से प्रभावित करने के प्रयासों की जाँच का निर्देश दिया। यह जाँच वास्तविक है।लेकिन जिन आरोपों की जाँच हो रही है, वे अभी सिद्ध नहीं हुए हैं।
चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप से संबंधित खबर सामने आने के बाद लिकुड और नेतन्याहू समर्थकों ने अरब पार्टियों पर चुनावी अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए। कुछ इज़रायली मीडिया रिपोर्टों में कतर का नाम भी सामने आया। लेकिन शिन बेट ने शाम को स्पष्ट किया कि जाँच से संबंधित सूचना उसकी अपनी खुफिया गतिविधियों से प्राप्त हुई थी, न कि किसी राजनीतिक दल से। एजेंसी ने कहा कि जाँच अभी पूरी नहीं हुई है और आरोपों की प्रकृति के बारे में सार्वजनिक दावे करना उचित नहीं है। शिन बेट ने विशेष रूप से कहा कि इस जाँच को किसी पूरे समुदाय के लोकतांत्रिक मतदान पर आरोप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इज़रायली पुलिस ने भी चुनाव में व्यापक धांधली के आरोपों के संबंध में स्पष्ट किया कि उसके पास इन दावों का समर्थन करने वाला कोई जाँच-संबंधी या खुफिया आधार नहीं है। केंद्रीय चुनाव आयोग ने कहा कि चुनाव नियमानुसार संचालित हुआ और व्यवस्थित रूप से गड़बड़ी किए जाने के दावों का अभी कोई स्थापित आधार नहीं है। इस प्रकार विदेशी हस्तक्षेप की आशंका की जाँच और अरब मतदाताओं द्वारा व्यापक चुनावी धोखाधड़ी किए जाने का राजनीतिक आरोप—दो अलग मुद्दे हैं। किसी भी जाँच के अस्तित्व को चुनाव परिणाम अमान्य होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कतर ने कहा—हमें इज़रायल के राजनीतिक विवाद में घसीटा जा रहा है
कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने गुरुवार दोपहर इन आरोपों का स्पष्ट खंडन किया। उन्होंने कहा कि कतर ने इज़रायल के चुनाव में हस्तक्षेप नहीं किया और किसी राजनीतिक गतिविधि को प्रभावित करने के लिए धन उपलब्ध नहीं कराया। उनका कहना था कि इज़रायल के कुछ राजनीतिक व्यक्तियों और मीडिया से जुड़े लोगों ने कतर को वहाँ के घरेलू राजनीतिक विवादों में घसीटने के लिए भ्रामक अभियान शुरू किया है। उन्होंने इन आरोपों को अनुचित और खतरनाक बताया।
इज़रायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि चुनाव की निष्पक्षता लोकतंत्र का मूल आधार है और किसी भी गंभीर संदेह की पूरी जाँच होनी चाहिए। लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि जाँच के नाम पर पूरे समुदाय को बदनाम करने से बचना चाहिए। राष्ट्रपति की इस प्रतिक्रिया का विशेष महत्व है क्योंकि अरब नागरिकों ने इस चुनाव में बड़ी संख्या में मतदान किया और उनके राजनीतिक दलों की संसदीय ताकत बढ़ी है।
आइज़नकोट ने कहा—जाँच के नाम पर नई संसद के गठन में बाधा न डाली जाए
विदेशी हस्तक्षेप के आरोप सामने आने के बाद आइज़नकोट ने नेतन्याहू की आलोचना करते हुए कहा कि चुनाव परिणामों की वैधता पर राजनीतिक अभियान चलाना उचित नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी वास्तविक अनियमितता की जाँच होनी चाहिए। लेकिन उसके आधार पर नई संसद के गठन या जनादेश की संवैधानिक प्रक्रिया में अनावश्यक बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। आइज़नकोट ने नेतन्याहू के नजदीकी लोगों से जुड़े पुराने कतर संबंधी विवादों का उल्लेख करते हुए उनके राजनीतिक रवैये पर भी सवाल उठाए। ये आरोप और जवाब राजनीतिक नेताओं के परस्पर दावे हैं। इनसे चुनाव में हस्तक्षेप के किसी विशेष आरोप की पुष्टि नहीं होती।
अरब पार्टियों के गठबंधन जॉइंट लिस्ट ने भी नेतन्याहू के आरोपों का विरोध किया। पार्टी ने कहा कि अरब मतदाताओं ने बड़ी संख्या में भाग लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से अपने प्रतिनिधि चुने हैं। जॉइंट लिस्ट ने विपक्षी दलों से आह्वान किया कि वे अरब मतदाताओं की राजनीतिक भागीदारी को स्वीकार करें और नेतन्याहू के विकल्प के लिए सहयोग करें। पार्टी के नेता यूसुफ जबारीन और अहमद तिबी पहले ही विपक्ष को सहयोग देने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं।
विदेशी समाचार माध्यमों का आकलन : तीन गठबंधन विकल्प, लेकिन किसी पर सहमति नहीं
चुनाव के बाद पैदा हुए गतिरोध को तोड़ने की संवैधानिक और राजनीतिक संभावनाओं के मुताबिक़ पहला विकल्प नेतन्याहू के नेतृत्व वाली ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार का है जिसमें लिकुड के साथ आइज़नकोट की यशार, बेनेट की बेयाखाद और लिबरमैन की पार्टी जैसे दल शामिल हो सकते हैं। रॉयटर्स ने ऐसे एक संभावित संयोजन को 66 सीटों वाला बताया है। लेकिन यह एक गणितीय उदाहरण है, वास्तविक गठबंधन नहीं। इसके लिए कई नेताओं को चुनाव से पहले किए गए वादे बदलने होंगे।
दूसरा विकल्प आइज़नकोट के नेतृत्व वाली ऐसी सरकार है जिसे अरब दल बाहर से समर्थन दें। विपक्ष के 48 और अरब दलों के 19 सांसदों को जोड़ने पर 67 की संख्या बनती है। लेकिन लिबरमैन का गुरुवार का बयान इस संभावना के सामने बड़ी राजनीतिक कठिनाई प्रस्तुत करता है। तीसरा विकल्प नेतन्याहू द्वारा विपक्षी दलों के कुछ सांसदों या दलों का समर्थन प्राप्त करना है। इसमें भी राजनीतिक दलों के पूर्व घोषित रुख और दल-बदल से संबंधित कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण होंगे। यदि किसी व्यवस्था पर समझौता नहीं होता, तो संवैधानिक प्रक्रिया के अंत में दोबारा चुनाव की स्थिति बन सकती है।
ब्रिटेन के ‘द गार्जियन’ ने गुरुवार के अपने लाइव चुनाव कवरेज में विशेष रूप से अरब दलों की भूमिका तथा विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों पर ध्यान दिया। अख़बार ने कतर के खंडन, चुनाव अधिकारियों की प्रतिक्रिया और विपक्षी नेताओं की आलोचना को अपनी रिपोर्ट में स्थान दिया। वहीं समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने चुनाव के बाद जारी आरोप-प्रत्यारोप और गठबंधन गतिरोध की चर्चा करते हुए बताया कि इज़रायल के सामने राजनीतिक सहमति बनाने की चुनौती अभी बनी हुई है। दोनों अंतरराष्ट्रीय स्रोतों ने चुनाव संबंधी आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जाँच और राजनीतिक विवाद के विषय के रूप में प्रस्तुत किया है।
राष्ट्रपति हर्ज़ोग की भूमिका और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया
नई संसद की आधिकारिक संरचना स्पष्ट होने के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग राजनीतिक दलों से परामर्श करेंगे। प्रत्येक दल अपनी ओर से उस नेता का नाम सुझा सकता है जिसे वह प्रधानमंत्री बनते देखना चाहता है। राष्ट्रपति को यह देखना होगा कि किस उम्मीदवार के पास सरकार गठन के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने की क्षमता है। पहले उम्मीदवार को सामान्यतः 28 दिन और जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय मिलता है। उसके विफल होने पर दूसरे उम्मीदवार को 28 दिन का अवसर दिया जा सकता है। आगे संसद के 61 सदस्यों के समर्थन से तीसरे प्रयास का संवैधानिक रास्ता भी मौजूद है।
इस पूरे समय नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। अंतिम जाँच के बाद आधिकारिक चुनाव परिणाम चार नवंबर को प्रकाशित होने की अपेक्षा है। उसके बाद राष्ट्रपति की औपचारिक परामर्श प्रक्रिया सरकार गठन की दिशा तय करेगी। राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने दलों से पहले ही कहा है कि उन्हें खुले मन से बातचीत करनी चाहिए और नए चुनाव की नौबत से बचने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।
29 अक्टूबर की रात तक वास्तविक स्थिति क्या है?
गुरुवार के पूरे घटनाक्रम को देखें तो कुछ बातें स्पष्ट हैं। सबसे पहले, विशेष मतपत्रों सहित गणना का मुख्य चरण समाप्त हो चुका है और नई संसद का अंतरिम स्वरूप सामने आ गया है। दूसरी बात, नेतन्याहू के पास 53 सांसदों वाला सबसे बड़ा घोषित गठबंधन है, लेकिन बहुमत नहीं है। तीसरी बात, आइज़नकोट के खेमे के पास 48 सीटें हैं, जबकि 19 अरब सांसद सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चौथी बात, लिबरमैन ने नेतन्याहू तथा अरब दलों दोनों के साथ सरकार बनाने से इनकार करके राजनीतिक मतभेदों को स्पष्ट कर दिया है।
गुरुवार को राष्ट्रीय एकता सरकार के लिए नेतन्याहू के नजदीकी सूत्रों द्वारा सामने रखे गए प्रस्ताव ने नई राजनीतिक चर्चा शुरू की है। गोलान और लापिद की मुलाकात ने विपक्षी संपर्कों की पुष्टि की है। दूसरी ओर विदेशी चुनावी हस्तक्षेप के आरोपों और शिन बेट की जाँच ने राजनीतिक विवाद को नया आयाम दिया है। फिर भी 29 अक्टूबर की रात तक किसी नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, न ही किसी नेता को सरकार बनाने का संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है।
इज़रायल के सामने अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किन दलों के बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति बन सकती है। सेना में धार्मिक समुदायों की भर्ती, सात अक्टूबर की सुरक्षा विफलता की जाँच, न्यायपालिका, अरब नागरिकों की भागीदारी और ईरान से संबंधित नीति जैसे विषय नई सरकार की बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं। आगामी दिनों में इन्हीं मुद्दों पर होने वाले समझौते या मतभेद इज़रायल की नई सरकार का स्वरूप निर्धारित करेंगे।
