India supports Iran at UN: संयुक्त राष्ट्र (UN) के गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के कूटनीतिक हलकों में भूकंप ला दिया है। कल जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के विशेष सत्र के दौरान भारत ने वह कर दिखाया जिसकी उम्मीद पश्चिमी देशों को सपने में भी नहीं थी। जब अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ईरान को घेरने के लिए चक्रव्यूह रचा और उसके खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया, तब भारत ने बीच का रास्ता चुनने के बजाय सीना तानकर ईरान का साथ दिया। (India supports Iran at UN) भारत ने न केवल पश्चिमी देशों के इस प्रस्ताव का विरोध किया, बल्कि ‘NO’ वोट डालकर वाशिंगटन से लेकर लंदन तक सबको सन्न कर दिया है। यह कदम सिर्फ एक वोट नहीं है, बल्कि दुनिया को भारत का यह संदेश है कि अब नई दिल्ली के फैसले किसी विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर लिए जाएंगे।
India supports Iran at UN: एक ही पाले में भारत, चीन और पाकिस्तान
इस वोटिंग के दौरान एक ऐसा दुर्लभ नजारा देखने को मिला जो दशकों में कभी-कभी ही दिखता है। ईरान के समर्थन में और पश्चिमी प्रस्ताव के विरोध में भारत, चीन और पाकिस्तान—ये तीनों प्रतिद्वंद्वी देश एक ही सुर में बात करते नजर आए। (India supports Iran at UN) भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया, वियतनाम, इराक और क्यूबा ने भी इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। हालांकि, अमेरिका के प्रभाव वाले 25 देशों (जैसे फ्रांस, जर्मनी, यूके और जापान) ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जिससे तकनीकी रूप से यह पास तो हो गया, लेकिन भारत जैसे ‘ग्लोबल साउथ’ के लीडर के विरोध ने इस प्रस्ताव की नैतिक ताकत को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
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भारत के ‘NO’ के पीछे का सच
आखिर भारत ने इतना बड़ा रिस्क क्यों लिया? इसके पीछे गहरी रणनीतिक वजहें हैं। भारत के लिए ईरान सिर्फ एक पड़ोसी नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक पहुँचने का गेटवे है। ईरान में स्थित ‘चाबहार पोर्ट’ भारत का एक ऐसा ड्रीम प्रोजेक्ट है जो उसे पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और रूस तक सीधा रास्ता देता है। (India supports Iran at UN) इसके अलावा, ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी ईरान भारत का एक पुराना और भरोसेमंद साथी रहा है। भारत ने यह ‘NO’ वोट डालकर अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब पश्चिमी देशों के ‘दोहरे मापदंडों’ के खिलाफ खुलकर बोलने लगा है।
इस फैसले के बाद अब देखना यह होगा कि जो अमेरिका और यूरोपीय देश भारत को अपना सबसे बड़ा लोकतांत्रिक साझेदार बताते हैं, वे भारत के इस ‘स्वतंत्र’ अवतार पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
