Europe Heatwave: यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। बढ़ते तापमान का सबसे ज्यादा असर स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल हालात इतने गंभीर हैं कि सर्दियों में जमी बर्फ सामान्य समय से कई महीने पहले ही पूरी तरह पिघल सकती है। (Europe Heatwave) इसे जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर संकेतों में से एक माना जा रहा है। स्विट्जरलैंड में ग्लेशियरों पर नजर रखने वाली संस्था के विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार बर्फ तेजी से खत्म हो रही है। आमतौर पर यह स्थिति अगस्त के आसपास देखने को मिलती थी, लेकिन इस बार जून के आखिर में ही लगभग पूरी बर्फ पिघलने की स्थिति बन गई है। इससे साफ है कि लगातार बढ़ती गर्मी ग्लेशियरों को तेजी से नुकसान पहुंचा रही है।
Europe Heatwave: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे क्या है वजह?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल सर्दियों में सामान्य से काफी कम बर्फबारी हुई। इसके बाद मई से ही यूरोप में तेज गर्मी शुरू हो गई, जिससे ग्लेशियरों को दोबारा मजबूत होने का मौका नहीं मिला। इसके अलावा मार्च में सहारा रेगिस्तान से उड़कर आई धूल भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। (Europe Heatwave) यह धूल ग्लेशियरों की सफेद सतह पर जम गई, जिससे बर्फ का रंग गहरा हो गया। सामान्य तौर पर सफेद बर्फ सूर्य की किरणों को वापस लौटा देती है, लेकिन गहरे रंग की सतह ज्यादा गर्मी सोखने लगती है। इससे बर्फ पहले से भी तेज गति से पिघलने लगी।
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यूरोप की बड़ी नदियों पर भी पड़ सकता है असर
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर केवल बर्फ के पहाड़ नहीं हैं, बल्कि वे पूरे यूरोप के लिए पानी का अहम स्रोत हैं। राइन और रोन जैसी बड़ी नदियों को सालभर पानी इन्हीं ग्लेशियरों से मिलता है। अगर ग्लेशियर लगातार इसी तरह सिकुड़ते रहे तो भविष्य में इन नदियों का जलस्तर घट सकता है। (Europe Heatwave) इसका असर पीने के पानी, खेती, जल परिवहन और बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या सिर्फ स्विट्जरलैंड तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे यूरोप को प्रभावित कर सकती है।
एक दशक में तेजी से बढ़ा ग्लेशियरों का नुकसान
वैज्ञानिकों के अनुसार, हाल ही में किए गए निरीक्षण में सिर्फ 10 दिनों के भीतर एक ग्लेशियर की करीब एक मीटर मोटी बर्फ पिघल गई। (Europe Heatwave) यह बदलाव सामान्य नहीं माना जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2000 के बाद से स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों का आकार लगातार घट रहा है। पिछले दो दशकों में कई छोटे ग्लेशियर पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, 2000 से 2024 के बीच देश के ग्लेशियर करीब 38 प्रतिशत तक सिकुड़ गए हैं।
जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिकों की चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार इसी तरह बनी रही तो आने वाले दशकों में आल्प्स पर्वत क्षेत्र के अधिकांश ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इससे पर्यावरण, मौसम और जल संसाधनों पर गंभीर असर पड़ेगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। उनका कहना है कि बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रभावी कदम उठाना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को बचाया जा सके।
