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Kenya: केन्या की सरकार ने 10 लाख भारतीय कौवों को मारने का क्यों बनाया है प्लान?

Sunil Kumar Verma
Last updated: 2024/06/15 at 10:42 पूर्वाह्न
Sunil Kumar Verma
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9 Min Read
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Kenya: केन्या सरकार ने भारतीय कौवों के खिलाफ जंग छेड़ दी है. केन्या वाइल्डलाइफ सर्विस (KWS) का कहना है कि ये ‘इंडियन हाउस क्रो’ विदेशी पक्षी हैं, जो पिछले कई दशकों से वहां रहने वाले लोगों को परेशान कर रहे हैं.

Contents
Kenya: कौवों की खासियत क्या होती हैसबसे ज्यादा कहां पाए जाते हैं कौवे?कौवों से केन्या को कैसा नुकसान?कौवों को किस तरह मारने का प्लान हैजब ऑस्ट्रेलिया में 10,000 ऊंटों को मारने का दिया गया आदेश

KWS ने साल 2024 के अंत तक केन्या के पूरे तटीय इलाके से दस लाख कौवों को खत्म करने का ऐलान किया है. ये काले कौवे भारतीय मूल के बताए जा रहे हैं. माना जाता है कि 1940 के आसपास ये पूर्वी अफ्रीका में आ पहुंचे थे. तब से इनकी संख्या काफी बढ़ गई है और ये आक्रामक होते जा रहे हैं.

केन्या सरकार का कहना है कि इन विदेशी कौवों की वजह से केन्या के असली पक्षियों की संख्या बहुत कम हो गई है. इनमें धारीदार बबूल पंछी (स्केली बब्लर्स), सफेद काले कौवे (पाइड क्रोज़), चूहे के रंग की सूरजपक्षी (माउस-कलर्ड सनबर्ड), बीनने वाले पंछी (वीवर बर्ड्स), छोटे चटख रंग के पंछी (कॉमन वैक्सबिल्स) और पानी के पास रहने वाले पंछी भी शामिल हैं.

Kenya: कौवों की खासियत क्या होती है

कौवों को सीलोन कौवा, कोलंबो कौवा या ग्रे नेक्ड कौवों के नाम से भी जाना जाता है. ये कौवा न तो बहुत बड़ा है और न ही बहुत छोटा. (Kenya) इसकी लंबाई करीब 40 सेंटीमीटर (16 इंच) होती है. काले गरुड़ से ये थोड़ा छोटा और मांस खाने वाले गरुड़ से दुबला होता है.

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इसकी खासियत है इसका रंग- सिर, गला और सीना काला चमकता हुआ, गर्दन और सीने का निचला हिस्सा हल्का भूरा होता है. पंख, पूंछ और पैर काले होते हैं. हालांकि, ये रंग थोड़े बहुत अलग भी हो सकते हैं, ये इस बात पर निर्भर करता है कि वो कहां रहता है. इसकी चोंच की मोटाई और पंखों के रंग में अलग-अलग इलाकों के हिसाब से थोड़ा बहुत फर्क हो सकता है.

सबसे ज्यादा कहां पाए जाते हैं कौवे?

ये कोवे मुख्य रूप से दक्षिण एशिया में पाए जाते हैं. ये मूल रूप से नेपाल, बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव्स, दक्षिणी म्यांमार, दक्षिणी थाईलैंड और ईरान के दक्षिणी तटीय इलाकों में पाए जाते हैं. लगभग 1897 के आसपास जहाजों के जरिए इन्हें पूर्वी अफ्रीका (ज़ांजीबार के आसपास) और पोर्ट सूडान ले जाया गया था.

जहाजों से ही ये ऑस्ट्रेलिया भी पहुंचे थे लेकिन वहां से अब इनका खात्मा कर दिया गया. (Kenya) हाल ही में, ये यूरोप भी पहुंच गए हैं और 1998 से नीदरलैंड के हार्बर टाउन हुक ऑफ हॉलैंड में रह रहे हैं.

अमेरिका के फ्लोरिडा में भी इन पक्षियो को देखा गया है. वहीं यमन के सोकोत्रा द्वीप पर साल 2009 तक ये कौवे रहते थे, लेकिन वहां के खास पक्षियों को नुकसान न पहुंचे, इसलिए इन कौवों को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया. ये अक्सर गांव से लेकर बड़े शहरों तक, हर जगह इंसानों के आस-पास ही रहते हैं. सिंगापुर में तो 2001 में हर वर्ग किमी में 190 वौवे हुआ करते थे. वहां अब इनकी संख्या कम करने की कोशिश की जा रही है.

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कौवों से केन्या को कैसा नुकसान?

केन्या में पक्षी विशेषज्ञ कोलिन जैक्सन का कहना है कि इन भारतीय कौवों की वजह से केन्या के समुद्री इलाकों में छोटे, स्थानीय पक्षियों की संख्या बहुत कम हो गई है. ये भारतीय कौवे छोटे पक्षियों के घोंसले उजाड़ देते हैं. फिर उनके अंडे और चूजों को खा जाते हैं.

कोलिन जैक्सन ने कहा, “जब जंगल के असली पक्षी कम हो जाते हैं, तो पूरा वातावरण खराब हो जाता है. कीड़े-मकोड़े और दूसरी छोटी जीव जंतु बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, जिससे एक के बाद एक परेशानी खड़ी हो जाती है. (Kenya) इन कौवों का असर सिर्फ उन्हीं पक्षियों पर नहीं पड़ता जिन्हें वो खाते हैं, बल्कि पूरे वातावरण को नुकसान पहुंचाता है.”

बताया जा रहा है कि ये कौवे सिर्फ जंगली पक्षियों के लिए ही मुसीबत नहीं हैं, बल्कि टूरिस्ट और होटल इंडस्ट्री को भी काफी परेशानी दे रहे हैं. ये दोनों ही उद्योग केन्या के लिए विदेशी मुद्रा कमाने के लिए बहुत जरूरी हैं. समुद्र किनारे स्थित होटल वालों का कहना है कि ये कौवे खाने के वक्त सैलानियों को बहुत तंग करते हैं.

केन्या के स्थानीय मुर्गी पालक भी कौवों से परेशान हैं. क्योंकि ये कौवें हर दिन 10-20 चूजों को उठाकर ले जा सकते हैं. इसलिए उन्हें पहले एक महीने तक मुर्गियों के बच्चों की बहुत देखभाल नहीं करनी पड़ती है. (Kenya) ये काफी ज्यादा संख्या में आते हैं और बेहद चालाक होते हैं. (Kenya) कुछ कौवे मुर्गियों और बत्तखों का ध्यान भटकाते हैं, फिर दूसरे ग्रुप के कौवे चूजों पर हमला कर देते हैं. ऐसे ही किसान भी इन बढ़ते हुए कौवों से परेशान हैं.

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कौवों को किस तरह मारने का प्लान है

ये पहली बार नहीं है जब केन्या सरकार कौवों की संख्या कम करने की कोशिश कर रही है. जंगली जीव जंतु विभाग (केडब्ल्यूएस) के मुताबिक, करीब 20 साल पहले भी ऐसी ही कोशिश की गई थी और उस वक्त पक्षियों की संख्या कम भी हो गई थी. (Kenya) लेकिन ये कौवे बहुत जल्दी सीख लेते हैं और इंसानों के आसपास ही रहते हैं, जिसकी वजह से उनकी संख्या फिर से बहुत बढ़ गई है. इसीलिए नई योजना बनाई गई है.

इस बार केन्या सरकार कौवों को खत्म करने के लिए कई तरीके अपना रही है. (Kenya) होटल चलाने वालों, कौवों को मारने का इंतजाम करने वाले डॉक्टरों, जंगल बचाने वाली संस्थाओं और रिसर्च करने वाली संस्थाओं के साथ मिलकर ये योजना बनाई गई है.

केन्या की पेस्ट कंट्रोल संस्था (पीसीपीबी) ने होटल चलाने वालों को जहर आयात करने की इजाजत दे दी है. (Kenya) उनका कहना है कि करीब 10 लाख जंगली कौवों को काबू करने का ये सबसे कारगर तरीका है जो केन्या के समुद्री इलाकों में रहते हैं. वन्यजीव विभाग (केडब्ल्यूएस) भी इन कौवों को मारने के लिए किसी खास तरीके को अपनाने की योजना बना रहा है. (Kenya) उनका मानना है कि ऐसे तरीका अपनाना जरूरी है जिससे दूसरे जंगली जानवरों और पूरे वातावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे.

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जब ऑस्ट्रेलिया में 10,000 ऊंटों को मारने का दिया गया आदेश

ऑस्ट्रेलिया में साल 2019 सबसे ज्यादा सूखा और गर्म साल रहा था. इस भयंकर सूखे की वजह से जंगली ऊंटों के बड़े-बड़े झुंड पानी की तलाश में दूर-दराज के गांवों की तरफ आ गए थे, जिससे वहां के आदिवासी समुदायों को खतरा पैदा हो गया था. हालांकि कुछ ऊंट प्यास से मर गए, तो कुछ पानी की तलाश में एक-दूसरे को रौंदते हुए मारे गए थे.

दावा किया गया कि ये जंगली ऊंट न सिर्फ कम बचे हुए पानी और खाने के स्रोतों को खतरा पहुंचा रहे थे, बल्कि सड़क बनाने जैसी चीजों को भी नुकसान पहुंचा रहे थे और रास्ते में चल रहे वाहनों के लिए भी खतरा बन गए थे. (Kenya)इन ऊंटों ने पानी के स्त्रोतों को भी गंदा कर दिया था. इसी खतरे को कम करने के लिए साल 2020 में ऊंटों को मारने का फैसला किया गया था. ऑस्ट्रेलिया के शार्पशूटर्स ने हेलिकॉप्टरों में बैठकर ऊंटों का शिकार किया.

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