Russia Ukraine War 2026: 24 फरवरी, 2022 की सुबह जब रूसी टैंक यूक्रेन की सीमाएँ पार कर रहे थे। मिसाइलें कीव, खारकीव और दूसरे शहरों की ओर जा रही थीं और व्लादिमीर पुतिन टेलीविजन पर ‘विशेष सैन्य अभियान’ की घोषणा कर रहे थे। तब बहुत कम लोगों ने कल्पना की होगी कि यह युद्ध साढ़े चार वर्ष बाद भी चल रहा होगा। रूस दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों में था। उसकी सेना यूक्रेन की तुलना में कई गुना बड़ी थी। उसके पास विशाल तोपखाना, वायुसेना, मिसाइलें और सोवियत काल से विरासत में मिला सैन्य उद्योग था। दूसरी तरफ यूक्रेन को पश्चिम से हथियार तो मिले थे। लेकिन फरवरी, 2022 में वह न नाटो (NATO) का सदस्य था और न किसी ऐसी रक्षा संधि में था जिसके कारण कोई पश्चिमी सेना सीधे उसकी ओर से युद्ध में उतरती।
आरंभिक रूसी आक्रमण की दिशा, कीव की ओर बढ़ती सेनाएँ, होस्तोमेल हवाई अड्डे पर हमला और बेलारूस से राजधानी पर दबाव इस धारणा को मजबूत करते थे कि कुछ दिनों या कुछ हफ्तों में यूक्रेनी सरकार गिर सकती है। ऐसा नहीं हुआ। लेकिन दूसरी ओर यूक्रेन और उसके समर्थकों की यह आशा भी पूरी नहीं हुई कि रूस को कुछ समय बाद पूरी तरह 1991 की सीमाओं के पीछे धकेल दिया जाएगा।
अगस्त, 2026 तक रूस लगभग 20 प्रतिशत यूक्रेनी भूभाग पर कब्ज़ा बनाए हुए है, जिसमें 2014 में कब्ज़ा किया गया क्रीमिया भी शामिल है। लेकिन वह यूक्रेन को अधीन करने, उसकी सरकार बदलने और उसे सैन्य रूप से निष्प्रभावी करने जैसे आरंभिक व्यापक उद्देश्यों से बहुत दूर है। यूक्रेन ने अपना राष्ट्र, राजधानी, सरकार और पश्चिम की ओर अपनी रणनीतिक दिशा बचा ली है। लेकिन इसके लिए उसने मनुष्य, भूभाग, अर्थव्यवस्था, घर, उद्योग, ऊर्जा व्यवस्था और अपनी भावी पीढ़ियों की ऐसी कीमत चुकाई है जिसकी भरपाई शायद कई दशकों में होगी।
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युद्ध का सबसे विचित्र निष्कर्ष इसलिए यह है कि रूस यूक्रेन को जीत नहीं पाया है। लेकिन यूक्रेन रूस को निकाल भी नहीं पाया है। और दोनों ने इतना खो दिया है कि अब जीत की परिभाषा स्वयं युद्ध का सबसे बड़ा राजनीतिक झूठ बनती जा रही है। अगस्त, 2026 में औपचारिक शांति वार्ताएँ लगभग ठहरी हुई हैं। रूस कहता है कि समझौते को ‘ज़मीन की वास्तविकता’ स्वीकार करनी होगी और यूक्रेन कहता है कि भूमि देकर शांति खरीदना अगली रूसी आक्रामकता को आमंत्रण होगा।
Russia Ukraine War 2026: युद्ध की जड़ें 2022 से बहुत पहले की हैं
इस युद्ध का कारण केवल 24 फरवरी, 2022 से शुरू करके समझना भी अधूरा होगा। इसकी जड़ें सोवियत संघ के विघटन, रूस और पश्चिम के बीच बिगड़ते संबंधों, NATO के पूर्वी विस्तार, यूक्रेन की पहचान और 2014 के संकट तक जाती हैं।
1991 में सोवियत संघ टूटने के बाद यूक्रेन स्वतंत्र राष्ट्र बना। अगले दो दशकों में उसकी राजनीति रूस समर्थक और यूरोप समर्थक ध्रुवों के बीच झूलती रही। रूस अपने आसपास के पूर्व सोवियत क्षेत्र को सुरक्षा और प्रभाव का विशेष क्षेत्र मानता रहा, जबकि मध्य और पूर्वी यूरोप के अनेक देशों ने सोवियत प्रभुत्व के अपने अनुभव के कारण NATO और यूरोपीय संघ में सुरक्षा तलाशनी शुरू की।
2008 के बुखारेस्ट शिखर सम्मेलन में NATO ने साफ लिखा कि यूक्रेन और जॉर्जिया भविष्य में उसके सदस्य बनेंगे। हालांकि न तारीख तय हुई और न यूक्रेन को तत्काल Membership Action Plan मिला। रूसी नेतृत्व ने इस घोषणा को अपनी सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक खतरे के रूप में लिया। NATO का तर्क उलटा था। वह यह कि स्वतंत्र देशों को अपने सुरक्षा गठबंधन चुनने का अधिकार है और रूस को उन पर वीटो नहीं मिल सकता।
इसलिए NATO विस्तार युद्ध की पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यह कहना कि NATO ने रूस को यूक्रेन पर हमला करने के लिए बाध्य कर दिया, तथ्यात्मक और कानूनी दोनों दृष्टि से बहुत आगे चला जाता है। किसी संप्रभु देश पर पूर्ण सैन्य आक्रमण करने का अंतिम निर्णय मॉस्को ने लिया था। और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे रूस द्वारा यूक्रेन के विरुद्ध आक्रामकता कहा। NATO की 2008 की घोषणा वास्तविक थी, रूसी सुरक्षा चिंताएँ भी वास्तविक थीं। लेकिन वे सैन्य आक्रमण को स्वतः वैध नहीं बनातीं।
2014 में शुरू हुआ युद्ध 2022 में और बड़ा हो गया
निर्णायक मोड़ 2014 में आया। कीव में यूरोमैदान आंदोलन के बाद रूस समर्थक समझे जाने वाले राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच सत्ता से हटे और देश छोड़कर रूस चले गये। मॉस्को ने इसे पश्चिम समर्थित सत्ता-परिवर्तन माना, जबकि यूक्रेन और पश्चिम ने इसे जन आंदोलन और राजनीतिक परिवर्तन बताया।
रूस ने इसके तुरंत बाद क्रीमिया पर नियंत्रण कर लिया और उसे अपने में मिला लिया, जिसे अधिकांश अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मान्यता नहीं दी। पूर्वी यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों में रूस समर्थक सशस्त्र समूहों ने सरकारी इमारतें और हथियारों के भंडार कब्ज़े में लिये, स्वयंभू ‘डोनेत्स्क पीपुल्स रिपब्लिक’ और ‘लुहांस्क पीपुल्स रिपब्लिक’ की घोषणा हुई और यूक्रेन ने इसे दबाने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया।
OSCE के दस्तावेज बताते हैं कि अप्रैल, 2014 से डोनेत्स्क और लुहांस्क के बड़े क्षेत्र कीव सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गये थे। मिन्स्क समझौते 2014 और 2015 में युद्ध रोकने के लिए बने। लेकिन युद्धविराम बार-बार टूटा और राजनीतिक प्रावधान कभी पूरी तरह लागू नहीं हुए।
रूस कहता रहा कि वह केवल मध्यस्थ है और संघर्ष मूलतः कीव तथा डोनबास के लोगों के बीच है, जबकि यूक्रेन और पश्चिम ने रूस पर हथियार, सैनिक और संगठनात्मक समर्थन देने का आरोप लगाया। इस प्रकार फरवरी 2022 किसी शून्य में शुरू हुई घटना नहीं थी। बल्कि आठ वर्ष से चल रहे युद्ध का अत्यंत व्यापक विस्तार था।
पुतिन के शुरुआती दावों की सबसे बड़ी परीक्षा
लेकिन युद्ध से ठीक पहले एक और परत जुड़ी। 2021 में रूस ने यूक्रेन की सीमाओं के आसपास विशाल सैन्य जमावड़ा किया। दिसंबर, 2021 में मॉस्को ने अमेरिका और NATO के सामने सुरक्षा प्रस्ताव रखे, जिनमें NATO के और पूर्व की ओर विस्तार को रोकना तथा यूक्रेन को सदस्य न बनाना प्रमुख था।
पश्चिम ने वार्ता की पेशकश की। लेकिन किसी संप्रभु देश को भविष्य में NATO से स्थायी रूप से बाहर रखने का रूसी अधिकार स्वीकार नहीं किया। 21 फरवरी, 2022 को पुतिन ने डोनेत्स्क और लुहांस्क के अलगाववादी क्षेत्रों को स्वतंत्र मान्यता दी और 24 फरवरी को युद्ध शुरू कर दिया। अपने भाषण में उन्होंने तीन मुख्य तर्क रखे – रूस की सुरक्षा NATO विस्तार से खतरे में है, डोनबास में रूसीभाषी लोगों के खिलाफ ‘genocide’ हो रहा है और यूक्रेन को ‘demilitarise’ तथा ‘denazify’ करना आवश्यक है।
यहीं दावों की पहली बड़ी परीक्षा शुरू होती है। NATO का विस्तार एक वास्तविक राजनीतिक विवाद था। लेकिन फरवरी, 2022 में यूक्रेन NATO का सदस्य नहीं था और वहाँ NATO की सामूहिक रक्षा लागू नहीं थी। ‘genocide’ का दावा कहीं अधिक कमजोर सिद्ध हुआ। मार्च, 2022 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा कि उस समय उसके सामने ऐसा प्रमाण नहीं था जो रूस के इस आरोप को पुष्ट करे कि यूक्रेनी भूभाग पर नरसंहार हुआ था। और उसने रूस को सैन्य अभियान रोकने का अंतरिम आदेश दिया।
‘denazification’ की अवधारणा तो और भी राजनीतिक नारा निकली। यूक्रेन में अतिदक्षिणपंथी संगठन मौजूद रहे हैं, जैसा लगभग हर यूरोपीय समाज में है। लेकिन वे राज्य पर नियंत्रण रखने वाली शक्ति नहीं थे। और स्वयं राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की यहूदी परिवार से आते हैं।
इसलिए चार वर्ष से अधिक समय बाद रूस के तीन शुरुआती औचित्यों में से NATO वाली सुरक्षा शिकायत वास्तविक भू-राजनीतिक विवाद थी। लेकिन नरसंहार और पूरे यूक्रेनी राज्य को नाज़ी बताने वाले तर्क स्वतंत्र प्रमाणों से पुष्ट नहीं हुए।
जिसे रूस निरस्त्र करने निकला, वह और ज्यादा सैन्यीकृत हो गया
रूस का ‘demilitarisation’ वाला दावा तो परिणामों की कसौटी पर लगभग उलटा सिद्ध हुआ। फरवरी, 2022 में यूक्रेन की सेना बड़ी जरूर थी। लेकिन NATO मानकों की अत्याधुनिक सेना नहीं थी। युद्ध के साढ़े चार वर्षों बाद यूक्रेन आधुनिक ड्रोन युद्ध, डिजिटल कमान, लंबी दूरी के हमले, पश्चिमी तोपखाना, वायु रक्षा, यूरोपीय मिसाइलों और युद्धक्षेत्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता में दुनिया की सबसे अनुभवी सेनाओं में से एक बन चुका है।
24 अगस्त, 2026 को ब्रिटेन ने यूक्रेन के साथ ऐसा रक्षा-तकनीकी समझौता किया जिसके तहत ब्रिटिश विशेषज्ञों को यूक्रेन के लाखों युद्धक्षेत्र चित्रों और ड्रोन डेटा पर आधारित प्रणाली तक पहुँच मिल रही है और ब्रिटेन-फ्रांस यूक्रेन को लंबी दूरी की SCALP/Storm Shadow तकनीक के स्थानीय उत्पादन में मदद कर रहे हैं।
दूसरे शब्दों में, जिसे रूस ‘निरस्त्रीकृत’ करने गया था वह देश पहले से कहीं अधिक सैन्यीकृत और पश्चिमी सैन्य प्रणाली में एकीकृत हो गया। और NATO को सीमा से दूर रखने की रणनीति का एक परिणाम यह हुआ कि फिनलैंड और स्वीडन NATO में शामिल हो गये, जिससे रूस की NATO के साथ प्रत्यक्ष सीमा उलटे बहुत बढ़ गई।
इतिहास में रणनीतिक उद्देश्य और परिणाम के बीच इससे अधिक स्पष्ट विरोधाभास कम मिलते हैं।
रूस ही नहीं, यूक्रेन और पश्चिम के कई दावे भी अधूरे निकले
लेकिन केवल रूस के शुरुआती दावों को गलत साबित करके कहानी पूरी नहीं होती। यूक्रेन और पश्चिम की कई शुरुआती उम्मीदें भी वास्तविकता की कसौटी पर अधूरी निकलीं।
24 फरवरी, 2022 को ज़ेलेंस्की ने कहा कि रूस दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग-थलग हो जाएगा और अभूतपूर्व प्रतिबंध उसे घेर लेंगे। प्रतिबंध सचमुच अभूतपूर्व लगे। रूस के केंद्रीय बैंक की विदेशी परिसंपत्तियों का बड़ा हिस्सा जमाया गया। अनेक पश्चिमी कंपनियाँ निकल गईं। यूरोप ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता बहुत कम की और तकनीकी प्रतिबंध लगे।
लेकिन रूस ‘पूरी दुनिया’ से अलग नहीं हुआ। चीन उसका सबसे बड़ा आर्थिक आधार बना। भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदा। तुर्की, खाड़ी देशों, मध्य एशिया और अनेक वैश्विक दक्षिण देशों ने उससे संबंध बनाए रखे। प्रतिबंधों ने लागत बढ़ाई लेकिन रूसी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त नहीं किया।
इसी तरह यूक्रेनी नेतृत्व की बार-बार व्यक्त वह आकांक्षा कि हर इंच भूमि वापस ली जाएगी अभी पूरी नहीं हुई। 2022 में खारकीव और खेरसोन क्षेत्र की शानदार यूक्रेनी जवाबी कार्रवाइयों ने रूस को पीछे धकेला। लेकिन 2023 का बड़ा यूक्रेनी प्रतिआक्रमण निर्णायक सफलता नहीं ला पाया और 2024-25 में रूस ने फिर कुछ क्षेत्रों में धीरे-धीरे बढ़त ली।
2026 में रूसी बढ़त कई मोर्चों पर ठहर गई और CSIS के आकलन के अनुसार अप्रैल-मई में रूस ने जितनी भूमि ली उससे लगभग 400 वर्ग किलोमीटर अधिक खो भी दी। फिर भी कुल मिलाकर वह लगभग पाँचवें हिस्से पर कब्ज़ा रखता है।
इस प्रकार यूक्रेन की सबसे बड़ी शुरुआती बात—हम राज्य के रूप में बचेंगे—सही सिद्ध हुई। लेकिन हम शीघ्र सभी कब्ज़े वाली भूमि वापस ले लेंगे—अभी सच नहीं हुई।
कीव पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर पाया रूस?
रूस के सबसे बड़े शुरुआती रणनीतिक दावे की परीक्षा कीव में हुई। पुतिन ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा था कि ‘कीव तीन दिनों में ले लिया जाएगा’, इसलिए बाद में प्रचलित ‘तीन दिन में कीव’ वाक्य को सीधे उनका आधिकारिक उद्धरण बताना गलत होगा।
लेकिन युद्ध की सैन्य संरचना स्पष्ट थी। बेलारूस से कीव की ओर भारी रूसी सेना बढ़ी, होस्तोमेल एयरफील्ड पर एयरबोर्न हमला हुआ और राजधानी को तेजी से घेरने का प्रयास हुआ। यदि उद्देश्य केवल डोनबास की रक्षा होता तो इतनी बड़ी सेना उत्तर से राजधानी पर नहीं भेजी जाती।
उस अभियान का विफल होना युद्ध का पहला निर्णायक मोड़ बना। मार्च-अप्रैल, 2022 में रूस कीव क्षेत्र से पीछे हट गया। ज़ेलेंस्की ने तीसरे ही दिन कहा था कि रूसी योजना कीव में अपना कठपुतली शासन स्थापित करने की थी और वह योजना टूट गई है। उस दावे का मूल भाग बाद की घटनाओं से काफी पुष्ट हुआ—यूक्रेनी सरकार गिरी नहीं, राष्ट्रपति देश छोड़कर नहीं गये और राजधानी रूसी नियंत्रण में नहीं आई।
रूस बाद में अपना मुख्य लक्ष्य डोनबास बताने लगा। इसलिए यदि युद्ध के मूल अधिकतम उद्देश्य को यूक्रेन को राजनीतिक रूप से झुकाना माना जाए तो रूस की पहली युद्ध-योजना निर्णायक रूप से विफल हुई।
रूस ने क्या जीता और उसकी कीमत क्या रही?
लेकिन उस विफलता की कीमत का अर्थ रूस की सैन्य पराजय नहीं था। रूस ने दक्षिण में क्रीमिया से उत्तर की ओर बढ़कर आज़ोव सागर के किनारे भूमि गलियारा स्थापित किया, मारियुपोल को भयंकर लड़ाई के बाद कब्ज़े में लिया, लुहांस्क के बड़े हिस्से और डोनेत्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया तथा खेरसोन के क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाया।
शहरों की कीमत असाधारण रही। मारियुपोल का बड़ा भाग खंडहर हुआ, बखमुत कई महीनों की लड़ाई में लगभग नष्ट हो गया और पूर्वी यूक्रेन के अनेक कस्बे मानचित्र पर नाम भर रह गये।
रूस ने 2022 में चार यूक्रेनी क्षेत्रों को अपने देश में मिलाने की घोषणा की, जबकि उनमें से किसी पर भी उसका पूर्ण नियंत्रण नहीं था। यूक्रेन और अधिकांश विश्व उन्हें रूसी भूमि नहीं मानते।
यही आज शांति का सबसे कठिन सवाल है—मॉस्को चाहता है कि जमीन पर उसकी सैन्य उपलब्धियों को स्थायी राजनीतिक वास्तविकता माना जाए, जबकि कीव के लिए ऐसा करना बलपूर्वक सीमा बदलने को कानूनी मान्यता देना होगा।
यूक्रेन का सबसे बड़ा नुकसान जमीन नहीं, इंसान हैं
मानवीय नुकसान की तुलना में दोनों देशों के बीच असमानता बहुत बड़ी है। युद्ध रूसी भूभाग तक ड्रोन और मिसाइलों के रूप में पहुँच चुका है। लेकिन भौतिक विनाश का भारी बहुमत यूक्रेन में हुआ है। क्योंकि मुख्य भूमि युद्ध वहीं लड़ा जा रहा है।
विश्व बैंक, यूरोपीय आयोग, संयुक्त राष्ट्र और यूक्रेन सरकार की फरवरी, 2026 की संयुक्त RDNA5 रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर, 2025 तक यूक्रेन में प्रत्यक्ष भौतिक क्षति 195 अरब डॉलर से अधिक पहुँच चुकी थी और अगले दस वर्षों में पुनर्निर्माण एवं पुनर्बहाली की आवश्यकता लगभग 588 अरब डॉलर आँकी गई—यूक्रेन के अनुमानित 2025 सकल घरेलू उत्पाद के लगभग तीन गुना के बराबर।
सर्वाधिक क्षति आवास, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्रों में हुई। ये आंकड़े 2026 के जारी हमलों को पूरी तरह शामिल भी नहीं करते। जनवरी-फरवरी 2026 में ऊर्जा तंत्र पर हमलों के बाद कुछ समय कीव का बड़ा हिस्सा बिजली से वंचित रहा और राष्ट्रीय विद्युत क्षमता में भारी कमी दर्ज की गई।
इसलिए ‘कौन-सा देश अधिक तहस-नहस हुआ?’ का उत्तर अस्पष्ट नहीं है—यूक्रेन कई गुना अधिक शारीरिक रूप से नष्ट हुआ है। रूस आर्थिक, जनसांख्यिकीय और सैन्य कीमत चुका रहा है। लेकिन उसके अधिकांश शहर सामान्य जीवन जीते रहे हैं। यूक्रेन का बड़ा भूभाग सीधे युद्धक्षेत्र बना है।
सैनिकों की मौत का सही आंकड़ा अभी भी रहस्य
मनुष्य की कीमत पर बिल्कुल सटीक संख्या बताना अभी संभव नहीं है और जो भी व्यक्ति निश्चित आंकड़ा देता है वह युद्धकालीन धुंध को नज़रअंदाज़ करता है। दोनों सरकारें अपने सैन्य नुकसान सीमित रूप से सार्वजनिक करती हैं और विरोधी के नुकसान को बढ़ाकर बताती हैं। स्वतंत्र और विश्लेषणात्मक अनुमानों में बहुत अंतर है।
जुलाई, 2026 के CSIS आकलन के अनुसार फरवरी, 2022 से जून, 2026 तक रूसी सेना के लगभग 14 लाख कुल युद्धक्षेत्र नुकसान—मृत, घायल और लापता—और 4 से 4.5 लाख तक मौतें हो सकती हैं। उसी अध्ययन ने यूक्रेन के कुल सैन्य नुकसान लगभग 5.25 से 6.25 लाख और मृतक 1.25 से 1.5 लाख आँके। ये आधिकारिक नहीं बल्कि मॉडल आधारित अनुमान हैं, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं कहा जाना चाहिए।
दूसरी ओर Mediazona और BBC Russian की नाम-आधारित स्वतंत्र गणना ने 13 अगस्त, 2026 तक 2.39 लाख से अधिक रूसी सैनिकों की मौत पहचान के साथ सत्यापित कर ली थी। और स्वयं शोधकर्ता मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक है।
इससे कम-से-कम इतना निर्विवाद है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी रूसी सैन्य अभियान में इतनी भारी जनहानि नहीं हुई। यूक्रेन की जनसंख्या छोटी है, इसलिए संख्या में कम नुकसान भी उसके समाज पर अनुपाततः अत्यंत भारी पड़ता है।
नागरिकों की कीमत और 2026 में बढ़ती हिंसा
नागरिकों का नुकसान और भी त्रासद है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निगरानी मिशन ने मई, 2026 तक फरवरी, 2022 से 16,126 नागरिक मौतें और 46,590 घायल सत्यापित किये थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र स्वयं बार-बार कहता है कि वास्तविक संख्या अधिक है, विशेषकर उन कब्ज़े वाले क्षेत्रों में जहाँ स्वतंत्र सत्यापन कठिन है।
और युद्ध कम हिंसक होने के बजाय 2026 में नागरिकों के लिए अधिक घातक हुआ। 2026 के पहले छह महीनों में संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1,396 नागरिक मारे गये और 7,978 घायल हुए, जो एक वर्ष पहले की समान अवधि से 37 प्रतिशत अधिक था। जुलाई में स्थिति और बिगड़ी—कम-से-कम 437 नागरिक मारे गये और 2,610 घायल हुए, मई 2022 के बाद सबसे खराब मासिक स्तरों में से एक।
अगस्त में कीव, खारकीव और Kryvyi Rih जैसी जगहों पर फिर घातक मिसाइल और ड्रोन हमले हुए। यूक्रेन ने भी रूसी शहरों, तेलशोधक कारखानों, गोदामों और सैन्य-औद्योगिक ढाँचे पर बड़े ड्रोन हमले बढ़ाये हैं और इनमें रूसी नागरिक भी मारे गये हैं।
दोनों पक्ष नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाने से इनकार करते हैं, लेकिन युद्ध का भूगोल अब पहले की तुलना में रूस के भीतर भी कहीं अधिक गहरा हो चुका है।
लाखों लोग घर से दूर, एक पूरी पीढ़ी बदल गई
यूक्रेन की सबसे बड़ी दीर्घकालिक क्षति शायद इमारतों से भी ज्यादा जनसंख्या की है। फरवरी, 2026 तक लगभग 59 लाख यूक्रेनी विदेश में शरणार्थी बने हुए थे। जून 2026 के अंत में केवल यूरोपीय संघ में ही 44.1 लाख लोगों को अस्थायी सुरक्षा मिली हुई थी, जिनमें सबसे ज्यादा जर्मनी, पोलैंड और चेकिया में थे। जुलाई, 2026 के IOM आंकड़े यूक्रेन के भीतर लगभग 34.5 लाख विस्थापित बताते हैं।
करोड़ों परिवार किसी न किसी रूप में युद्ध, प्रवास, अलगाव या सैन्य सेवा से प्रभावित हुए हैं। जन्मदर युद्ध से पहले ही कम थी। अब युवा महिलाएँ और बच्चे बड़ी संख्या में विदेश में हैं। पुरुष युद्धक्षेत्र पर हैं। विवाह और जन्म टल रहे हैं तथा बड़ी संख्या में परिवार वर्षों से अलग हैं।
यही प्रश्न पुनर्निर्माण के बाद भी रहेगा—घर बना दिये जाएंगे। लेकिन क्या लोग वापस आएंगे? किसी अर्थव्यवस्था के लिए कारखाने और सड़कें फिर बनाना संभव है। लेकिन खोई हुई युवा पीढ़ी और जन्म न लेने वाली पीढ़ी को वापस नहीं लाया जा सकता।
युद्ध के बच्चे और मानसिक स्वास्थ्य का संकट
शिक्षा पर युद्ध ने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की है जिसने कक्षा से अधिक बंकर और ऑनलाइन पाठ देखे हैं। स्कूल नष्ट हुए, बच्चों ने बार-बार शहर बदले, लाखों विद्यार्थी विदेशी शिक्षा प्रणालियों में चले गये। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या इसी कारण केवल सैनिकों की समस्या नहीं रही।
UNHCR के 2025 आकलन में लगभग 60 प्रतिशत यूक्रेनी परिवारों ने किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य चिंता की सूचना दी। बच्चों के भीतर हवाई हमले के सायरन सामान्य जीवन का हिस्सा बन गये हैं।
युद्ध विधवाओं, घायल सैनिकों, अंग-विच्छेद झेल चुके लोगों और युद्धोत्तर आघात से ग्रस्त लाखों नागरिकों की एक नई सामाजिक संरचना बना रहा है। आने वाले दशकों में यूक्रेन को केवल पुनर्निर्माण मंत्रालय नहीं, बड़े पैमाने पर मानसिक स्वास्थ्य, कृत्रिम अंग, पुनर्वास, सैनिकों की नागरिक जीवन में वापसी और युद्ध-अनाथ बच्चों की सहायता का ढाँचा चाहिए होगा।
अर्थव्यवस्था: यूक्रेन पश्चिम के सहारे, रूस युद्ध के सहारे
अर्थव्यवस्था के मामले में यूक्रेन एक युद्धरत राष्ट्र से कहीं अधिक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर निर्भर राज्य बन गया है। देश अपनी कर-आय से पूरे युद्ध और सामान्य शासन दोनों का खर्च नहीं चला सकता।
2025 में SIPRI के अनुसार यूक्रेन का सैन्य खर्च लगभग 84.1 अरब डॉलर, यानी उसके सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत था—दुनिया में सबसे अधिक सैन्य बोझ। 2026 में यूरोपीय संघ ने बजट और रक्षा उत्पादन के लिए दर्जनों अरब यूरो की नई सहायता संरचना बनाई और मार्च तक यूरोपीय आयोग ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद यूरोपीय संघ का कुल समर्थन लगभग 194.9 अरब यूरो पहुँच चुका था, जो उसके बाद भी बढ़ा।
24 अगस्त को यूरोपीय आयोग ने रक्षा के लिए और 6.1 अरब यूरो स्वीकृत किये। इसका मतलब यह नहीं कि यूक्रेन ‘कृत्रिम रूप से’ जीवित है—उसकी अपनी अर्थव्यवस्था, कृषि, तकनीक और उद्योग काम कर रहे हैं—लेकिन राज्य की युद्ध क्षमता अब यूरोपीय वित्त और हथियार आपूर्ति से संरचनात्मक रूप से जुड़ी है।
यदि पश्चिमी समर्थन अचानक समाप्त हो जाए तो कीव के लिए मौजूदा युद्ध-स्तर बनाए रखना अत्यंत कठिन होगा।
रूस की अर्थव्यवस्था टूटी नहीं, लेकिन युद्ध ने उसे बदल दिया
रूस की आर्थिक कहानी बिल्कुल अलग और पश्चिम की शुरुआती अपेक्षाओं से अधिक जटिल है। 2022 में कई विश्लेषकों को लगा था कि प्रतिबंध, विदेशी कंपनियों का पलायन और विदेशी मुद्रा भंडार जमने से रूसी अर्थव्यवस्था जल्दी टूट सकती है। ऐसा नहीं हुआ।
रूस ने तेल और गैस का व्यापार यूरोप से हटाकर एशिया की ओर मोड़ा, चीन के साथ व्यापार बढ़ाया। भारत जैसे देशों को रियायती तेल बेचा। पूँजी नियंत्रण लगाए और सैन्य उद्योग पर विशाल सरकारी खर्च किया। युद्ध ने कुछ क्षेत्रों में रोजगार और वेतन भी बढ़ाया।
लेकिन यह सामान्य स्वस्थ विकास नहीं है। SIPRI के अनुसार 2025 में रूस ने लगभग 190 अरब डॉलर, यानी GDP का 7.5 प्रतिशत सैन्य खर्च पर लगाया और सरकारी व्यय का लगभग 20 प्रतिशत सैन्य मदों में गया। 2026 के बजट में भी लगभग 14.9 ट्रिलियन रूबल, लगभग 6.3 प्रतिशत GDP सैन्य खर्च के लिए रखे गये।
युद्धकालीन खर्च से अर्थव्यवस्था गर्म हुई, मुद्रास्फीति बढ़ी, श्रमिकों की कमी हुई, ब्याज दरें ऊँची रखनी पड़ीं और नागरिक सामाजिक खर्च पर दबाव बढ़ा। CSIS ने 2025 की वृद्धि केवल लगभग 0.6 प्रतिशत आँकी और विनिर्माण तथा उपभोक्ता मांग में कमजोरी की ओर संकेत किया।
फिर भी एक महत्वपूर्ण बात है—रूस आर्थिक रूप से परेशान हुआ है, दिवालिया नहीं हुआ। और 2026 में ऊँची तेल कीमतों ने उसके बजट को नया सहारा भी दिया। इसलिए पश्चिमी प्रतिबंधों का दावा ‘रूस को कीमत चुकानी पड़ेगी’ सही निकला। लेकिन ‘रूसी अर्थव्यवस्था जल्दी ढह जाएगी’ गलत।
रूस में भी युद्ध की कीमत अब घर तक पहुँच रही है
रूस पर युद्ध अब उसकी अपनी धरती पर भी आर्थिक रूप से दिखाई देने लगा है। यूक्रेनी लंबी दूरी के ड्रोन तेल रिफाइनरियों, ईंधन डिपो, गोदामों और लॉजिस्टिक संरचनाओं तक पहुँचने लगे हैं।
जुलाई-अगस्त, 2026 में पेट्रोल की कमी और लंबी कतारें रूस के कई क्षेत्रों में दिखाई दीं और एक ऐसा देश जो परंपरागत रूप से ईंधन निर्यातक रहा है, उसे पेट्रोल आयात तक करना पड़ा।
अगस्त में पुतिन ने स्वयं यूक्रेनी हमलों से नष्ट वाणिज्यिक गोदामों के पुनर्निर्माण के लिए सरकारी सहायता का आदेश दिया और 24 अगस्त को महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा कमजोर होने पर सरकार को अस्थायी नियंत्रण लेने की शक्ति प्रदान की।
फिर भी तुलना का अनुपात याद रखना चाहिए—रूस में यह गंभीर आर्थिक असुविधा और बढ़ता युद्ध-जोखिम है। यूक्रेन में पूरे शहरों, बिजली संयंत्रों, मकानों और परिवहन ढाँचे का व्यापक विनाश है। दोनों देशों ने नुकसान झेला है। लेकिन भौतिक विनाश बराबर नहीं है।
रूस की अगली बड़ी समस्या उसकी आबादी हो सकती है
रूस का जनसांख्यिकीय नुकसान भी भविष्य में अधिक स्पष्ट होगा। लाखों पुरुष सेना में गये, लाखों लोग युद्ध के बाद 2022 की लामबंदी और राजनीतिक वातावरण से बचने के लिए देश से निकले, सैकड़ों हजार सैनिक मारे गये और उससे अधिक घायल हुए।
विशेष रूप से गरीब प्रांतों, साइबेरिया, सुदूर पूर्व, जातीय अल्पसंख्यक क्षेत्रों, स्वयंसेवकों और जेलों से भर्ती सैनिकों पर जनहानि का अनुपात अधिक रहा है। इससे मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग के मध्यवर्ग को प्रारंभिक वर्षों में युद्ध की कीमत अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष महसूस हुई। यही पुतिन की राजनीतिक स्थिरता का एक कारण है।
लेकिन श्रमशक्ति की कमी, प्रशिक्षित युवाओं का पलायन और युद्ध उद्योग द्वारा नागरिक उद्योग से श्रमिक खींच लेने के प्रभाव आने वाले वर्षों में बने रहेंगे। रूस ने भूमि जीती है। लेकिन उस भूमि के लिए उसने अपनी भावी उत्पादक आबादी का बड़ा हिस्सा खोया है।
पुतिन मजबूत हैं, लेकिन रूस में युद्ध से थकान भी बढ़ रही है
राजनीतिक व्यवस्था में भी दोनों देश बदल गये हैं। रूस में युद्ध के विरोध को अपराध बनाने वाले कानून बने। स्वतंत्र मीडिया और विपक्ष पर कार्रवाई बढ़ी। असहमति के लिए कठोर सजाएँ हुईं और अनेक आलोचक देश से बाहर चले गये या जेल गये।
इसलिए रूसी जनमत सर्वेक्षणों को पढ़ते समय भय और नियंत्रित सूचना वातावरण को ध्यान में रखना चाहिए। फिर भी स्वतंत्र Levada Center का जुलाई, 2026 सर्वेक्षण एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाता है। पुतिन के काम को 74 प्रतिशत लोगों ने मंजूरी दी। 66 प्रतिशत ने रूसी सेना की कार्रवाई का समर्थन किया। लेकिन 62 प्रतिशत अब शांति वार्ता चाहते हैं, जबकि केवल 28 प्रतिशत युद्ध जारी रखना चाहते हैं।
इसका अर्थ पुतिन के विरुद्ध विद्रोह नहीं है। वही सर्वेक्षण बताता है कि अधिकांश रूसी यूक्रेन या पश्चिम को बड़ी रियायत देने के पक्ष में नहीं हैं और 56 प्रतिशत उलटे यूक्रेन पर हमले तेज करने का समर्थन करते हैं।
यानी रूसी समाज में ‘युद्ध बंद हो’ और ‘रूस पीछे न हटे’ दोनों भाव एक साथ मौजूद हैं। युद्ध-थकान बढ़ी है। लेकिन पुतिन की सत्ता अभी उससे टूटी नहीं है।
ज़ेलेंस्की भी 2022 वाले निर्विवाद नेता नहीं रहे
यूक्रेन में ज़ेलेंस्की की स्थिति भी 2022 के नायक वाली लगभग सर्वसम्मत लोकप्रियता से अधिक मिश्रित हो चुकी है। युद्ध के पहले दिन राजधानी न छोड़ना उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक क्षण था। 2022 में वे यूक्रेनी प्रतिरोध का वैश्विक चेहरा बने।
लेकिन चार वर्षों से अधिक के युद्ध, भर्ती की कठिनाइयों, भ्रष्टाचार के मामलों, सरकार में फेरबदल, युद्ध की थकान और चुनाव न होने को लेकर बहस ने उनकी लोकप्रियता घटाई है। फिर भी यह कहना गलत होगा कि यूक्रेन ने उन्हें अस्वीकार कर दिया है।
जुलाई-अगस्त, 2026 के Kyiv International Institute of Sociology सर्वेक्षण में 55-56 प्रतिशत लोगों ने ज़ेलेंस्की पर भरोसा जताया और करीब 38-40 प्रतिशत ने अविश्वास। उनके मुकाबले पूर्व सेनाप्रमुख वालेरी ज़ालुझनी जैसे कुछ सार्वजनिक व्यक्तियों का भरोसा अधिक है।
साथ ही 57 प्रतिशत यूक्रेनी युद्ध समाप्त होने से पहले चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। मार्शल लॉ में चुनाव कानूनी रूप से भी स्थगित हैं। इसलिए ज़ेलेंस्की आज 2022 जितने निर्विवाद नहीं हैं। लेकिन अभी भी सकारात्मक भरोसा संतुलन रखते हैं।
कौन रूस के साथ और कौन यूक्रेन के साथ?
अब यह समझना जरूरी है कि किस देश के साथ कौन खड़ा है। यूक्रेन की रीढ़ यूरोप और NATO देश हैं। अमेरिका ने 2022 से 2024 तक सबसे महत्वपूर्ण हथियार, खुफिया जानकारी और आर्थिक सहयोग दिया। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी सैन्य सहायता घटने से यूरोप की भूमिका बढ़ी है।
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, नॉर्डिक देश, बाल्टिक देश, नीदरलैंड, चेकिया, कनाडा, यूरोपीय संघ की संस्थाएँ और अन्य NATO सदस्य हथियार, धन, प्रशिक्षण और राजनीतिक समर्थन देते रहे हैं। जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने भी विभिन्न स्तरों पर सहायता या प्रतिबंधों में योगदान दिया।
2026 में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ‘Coalition of the Willing’ के माध्यम से समर्थन समन्वित कर रहे हैं। और केवल यूरोपीय संघ की संचयी सहायता 200 अरब यूरो के आसपास पहुँच चुकी है और आगे बढ़ रही है। आज अमेरिका की अपेक्षा यूरोप यूक्रेन के दीर्घकालिक अस्तित्व का अधिक निर्णायक वित्तीय आधार बनता जा रहा है।
रूस के साथ चीन, उत्तर कोरिया और ईरान की अलग-अलग भूमिका
रूस की ओर गठबंधन आकार में छोटा लेकिन सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बेलारूस ने 2022 में अपने भूभाग को रूसी आक्रमण और लॉजिस्टिक आधार के रूप में उपलब्ध कराया और बाद में भी रूस की सैन्य व्यवस्था से जुड़ा रहा।
उत्तर कोरिया सबसे प्रत्यक्ष बाहरी सैन्य सहयोगी बन गया—उसने रूस को भारी मात्रा में तोप के गोले और बैलिस्टिक मिसाइलें दीं और उसके सैनिक भी रूस की ओर से लड़े। अगस्त, 2026 की दक्षिण कोरियाई जानकारी के अनुसार प्योंगयांग रूस को 1.5 करोड़ से अधिक तोप-गोला समतुल्य गोला-बारूद दे चुका हो सकता है।
ईरान ने युद्ध के शुरुआती वर्षों में Shahed ड्रोन तकनीक और हथियार देकर रूस की लंबी दूरी की हमले की क्षमता में महत्वपूर्ण योगदान किया, हालांकि बाद में रूस ने उन्हीं प्रकार के ड्रोन का विशाल घरेलू उत्पादन विकसित किया।
चीन की भूमिका सबसे संवेदनशील है—वह औपचारिक रूप से युद्ध में रूस का सैन्य सहयोगी नहीं है और स्वयं को शांति समर्थक बताता है। लेकिन रूसी व्यापार, औद्योगिक आपूर्ति, मशीन टूल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दोहरे उपयोग की वस्तुओं के लिए वह सबसे महत्वपूर्ण बाहरी आर्थिक जीवनरेखा है।
पश्चिमी देश चीन पर रूस के युद्ध उद्योग को अप्रत्यक्ष रूप से सक्षम करने का आरोप लगाते हैं। बीजिंग इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि उसका व्यापार सामान्य है।
चीन के बिना रूस युद्ध चला सकता है या नहीं, यह अनुमान का विषय है। लेकिन चीन के बिना इतनी लंबी अवधि तक वर्तमान पैमाने पर युद्ध चलाना रूस के लिए बहुत अधिक कठिन होता।
भारत की भूमिका क्यों अलग है?
भारत की स्थिति इनमें किसी एक खेमे में फिट नहीं होती। भारत रूस का पारंपरिक रक्षा साझेदार है और उसने युद्ध के बाद बड़ी मात्रा में सस्ता रूसी तेल खरीदा, जिससे रूस की निर्यात आय को अप्रत्यक्ष सहारा मिला।
लेकिन भारत ने रूस की ओर से युद्ध में हथियार या सैनिक भेजकर सैन्य गठबंधन नहीं बनाया और लगातार संवाद तथा युद्ध समाप्त करने की बात कही। इसी प्रकार तुर्की NATO सदस्य होते हुए यूक्रेन को ड्रोन देता रहा, रूस से व्यापार और संवाद बनाए रखा और अनाज समझौते तथा कैदी विनिमय में मध्यस्थ बना।
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुछ अन्य देशों ने भी मध्यस्थ या संपर्क बिंदु की भूमिका निभाई। इसलिए दुनिया ‘पश्चिम बनाम रूस’ के बिल्कुल दो बराबर खेमों में नहीं बँटी। पश्चिमी लोकतंत्रों का बड़ा हिस्सा यूक्रेन के साथ है। रूस के स्पष्ट सैन्य साझेदार सीमित हैं। लेकिन वैश्विक दक्षिण का बड़ा हिस्सा रूस को राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की पश्चिमी कोशिश में पूर्ण भागीदार नहीं बना।
रूस को रोकना था, लेकिन NATO और मजबूत हो गया
युद्ध ने यूरोप को भी बदल दिया। रूस का एक उद्देश्य NATO को अपनी सीमाओं से पीछे रखना था, परिणाम यह हुआ कि NATO का रक्षा बजट बढ़ा। फिनलैंड और स्वीडन सदस्य बने। पोलैंड और बाल्टिक देशों ने भारी पुनःशस्त्रीकरण किया और 2025 में NATO ने भविष्य में रक्षा एवं सुरक्षा संबंधित खर्च को GDP के 5 प्रतिशत तक ले जाने का नया लक्ष्य स्वीकार किया।
SIPRI के अनुसार 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च 14 प्रतिशत बढ़कर 864 अरब डॉलर हो गया। यह रूस के लिए एक रणनीतिक विफलता है जिसे केवल डोनबास में कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के लाभ से नहीं मापा जा सकता।
दूसरी ओर रूस ने पश्चिम को भी कीमत चुकाने पर मजबूर किया। यूरोप को महंगी ऊर्जा का दौर झेलना पड़ा, रक्षा खर्च बढ़ाना पड़ा, शरणार्थियों को समायोजित करना पड़ा और अमेरिका-यूरोप संबंधों में यूक्रेन सहायता को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ा। युद्ध ने NATO को मजबूत किया, लेकिन साथ ही पश्चिमी समाजों में ‘हम कब तक भुगतान करेंगे?’ वाली राजनीति को भी जन्म दिया।
खाद्य, ऊर्जा और काला सागर भी युद्ध के मोर्चे बने
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध की एक और छाया खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा है। रूस और यूक्रेन दोनों दुनिया के बड़े गेहूँ, मक्का और अन्य कृषि उत्पाद निर्यातक हैं। काला सागर युद्ध का आर्थिक मोर्चा बन गया।
तुर्की और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता वाला Black Sea Grain Initiative कुछ समय चला, फिर रूस 2023 में उससे बाहर हो गया। यूक्रेन ने वैकल्पिक समुद्री मार्गों और रोमानिया सहित यूरोपीय रास्तों से निर्यात कायम रखने का प्रयास किया।
2026 में दोनों पक्ष फिर बंदरगाह, जहाजरानी और ऊर्जा बुनियादी ढाँचे पर हमले बढ़ा रहे हैं। अगस्त में यूक्रेन ने नागरिक अनाज जहाजों पर हमले रोकने का सीमित युद्धविराम प्रस्तावित किया। लेकिन रूस ने उसे तेलशोधक कारखानों पर यूक्रेनी हमले रोकने से जोड़ दिया। यही छोटी घटना पूरे युद्ध की समस्या बताती है।ऐसे मुद्दे पर भी दोनों पक्ष मानते हैं कि यदि उसने पहले हमला रोक दिया तो दूसरा उसका लाभ उठा लेगा। विश्वास लगभग शून्य है।
युद्ध खत्म होने के बाद भी बारूदी सुरंगें और पर्यावरण रहेंगे
पर्यावरणीय नुकसान का हिसाब अभी आरंभिक है। बारूदी सुरंगें, तोप के गोले, नष्ट औद्योगिक संयंत्र, तेल और रसायन रिसाव, खेतों में विस्फोटक अवशेष, जंगल की आग, जलस्रोतों की क्षति और 2023 में काखोव्का बांध के विनाश ने विशाल क्षेत्रों की पारिस्थितिकी बदली।
यूक्रेन दुनिया के सबसे अधिक बारूदी सुरंग प्रभावित देशों में शामिल हो चुका है। इसका अर्थ यह है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी किसान खेत में हल चलाने से पहले विस्फोटक हटाएंगे और बच्चे वर्षों तक बिना फटे गोला-बारूद से खतरे में रहेंगे।
पुनर्निर्माण के 588 अरब डॉलर के अनुमान में सड़क और मकान दिखते हैं। लेकिन खो चुकी मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता और पीढ़ियों तक चलने वाले पर्यावरणीय प्रभावों का पूरा आर्थिक मूल्य मापना लगभग असंभव है।
युद्ध ने यूक्रेन और रूस के रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया
संस्कृति पर भी युद्ध केवल इमारतों का विनाश नहीं है। चर्च, संग्रहालय, ऐतिहासिक इमारतें, पुस्तकालय और सांस्कृतिक स्थल क्षतिग्रस्त हुए। उससे भी बड़ा परिवर्तन पहचान में हुआ।
यूक्रेन की एक बड़ी रूसीभाषी आबादी 2022 से पहले रूस के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं थी। रूस के आक्रमण ने उसी समाज में रूसी राज्य के प्रति गहरी दूरी पैदा की, यूक्रेनी भाषा और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत किया तथा उस सांस्कृतिक निकटता को तोड़ा जिसे पुतिन अक्सर रूस और यूक्रेन के ‘एक ऐतिहासिक लोग’ होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते थे। संभव है कि यही युद्ध की सबसे दीर्घकालिक रूसी रणनीतिक हार हो—जिस यूक्रेन को वह अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में रखना चाहता था, युद्ध ने उसकी कई पीढ़ियों को रूस से पहले से कहीं अधिक दूर कर दिया।
फिर शांति क्यों नहीं हो रही?
पहला कारण भूभाग है। रूस जितना क्षेत्र नियंत्रित करता है उसे जीत मानता है और पीछे हटना नहीं चाहता। यूक्रेन उसे कानूनी रूप से देने को तैयार नहीं।
दूसरा कारण सुरक्षा है। यूक्रेन पूछता है कि यदि वह भूमि छोड़ भी दे तो रूस को पाँच या दस वर्ष बाद फिर हमला करने से कौन रोकेगा। 1994 का बुडापेस्ट मेमोरेंडम उसे पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सका और 2014 के बाद मिन्स्क समझौते स्थायी शांति नहीं ला सके, इसलिए अब वह केवल कागजी वादा नहीं बल्कि हथियार, पश्चिमी गारंटी या NATO जैसी ठोस व्यवस्था चाहता है। रूस वही व्यवस्था अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
तीसरा कारण समय की अलग धारणा है। मॉस्को मानता है कि उसकी बड़ी आबादी, विशाल सैन्य उद्योग और संसाधन अंततः यूक्रेन तथा पश्चिमी धैर्य को थका देंगे। कीव मानता है कि रूस भारी हताहत, आर्थिक तनाव और यूक्रेनी लंबी दूरी के हमलों को अनंतकाल तक नहीं झेल सकता। जब दोनों पक्ष मानते हों कि समय उनके लिए काम कर सकता है, तब कोई भी आज समझौते में अधिक कीमत देना नहीं चाहता।
पुतिन और ज़ेलेंस्की के लिए समझौता राजनीतिक जोखिम क्यों है?
चौथा कारण नेताओं की व्यक्तिगत राजनीति है। पुतिन ने इस युद्ध को रूस की ऐतिहासिक सुरक्षा और महान-शक्ति स्थिति से जोड़ दिया है। यदि वे बिना किसी ठोस भू-राजनीतिक उपलब्धि के वापस लौटते हैं तो ‘विशेष सैन्य अभियान’ की पूरी वैधता पर प्रश्न उठेगा। ज़ेलेंस्की ने राष्ट्रीय अस्तित्व और क्षेत्रीय अखंडता का नेतृत्व किया है। यदि वे स्वयं यूक्रेनी भूमि स्थायी रूप से रूस को दे दें तो देश के भीतर उनकी वैधता पर प्रश्न उठ सकता है, विशेषकर उन सैनिक परिवारों के बीच जिन्होंने उसी भूमि के लिए बलिदान दिया।
इसलिए जो समझौता बाहर से ‘व्यावहारिक’ दिखाई देता है वह दोनों नेताओं के लिए भीतर से राजनीतिक आत्महत्या हो सकता है।
पाँचवाँ कारण बाहरी समर्थक हैं। यूक्रेन अभी भी यूरोप से इतना समर्थन प्राप्त कर रहा है कि उसे तुरंत आत्मसमर्पण की आवश्यकता नहीं। रूस को चीन, उत्तर कोरिया, अपने ऊर्जा निर्यात और युद्ध अर्थव्यवस्था से इतना संसाधन मिल रहा है कि उसे तत्काल पीछे हटने की जरूरत नहीं।
अमेरिका ने युद्ध समाप्त कराने के कई प्रयास किये लेकिन अगस्त, 2026 तक निर्णायक सफलता नहीं मिली और वॉशिंगटन का ध्यान ईरान युद्ध सहित अन्य संकटों से भी बँटा है। जर्मनी जैसे यूरोपीय देश अब अमेरिका से अधिक सक्रिय मध्यस्थता की अपील कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि शांति के लिए इच्छाशक्ति है। लेकिन शांति की समान परिभाषा नहीं है।
शांति की शुरुआत बड़े समझौते से नहीं, छोटे कदमों से हो सकती है
शांति की संभावना है लेकिन वह ‘महान शांति संधि’ से पहले छोटे समझौतों में दिखाई देती है। दोनों देश आज भी कैदियों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। 19 अगस्त, 2026 को दोनों ने 103-103 युद्धबंदी वापस किये। पहले भी अनाज, परमाणु संयंत्र, मानवीय गलियारे और कैदी विनिमय जैसे सीमित विषयों पर समझौते हुए हैं।
इससे साबित होता है कि संपर्क पूरी तरह टूटा नहीं है। पूर्ण युद्धविराम तब संभव होगा जब दोनों पक्ष यह मान लें कि अतिरिक्त एक वर्ष का युद्ध उन्हें मिलने वाले भूभाग या सुरक्षा की तुलना में अधिक महंगा पड़ रहा है। यह बिंदु अभी स्पष्ट रूप से नहीं आया है। लेकिन युद्ध-थकान रूस में बढ़ रही है और यूक्रेन में धन, सैनिक तथा वायु रक्षा की सीमाएँ हैं। इसलिए अगले एक-दो वर्षों में वार्ता की संभावना युद्ध के पहले वर्षों की तुलना में कम नहीं बल्कि अधिक हो सकती है।
सबसे संभावित अंत क्या होगा?
इस युद्ध का सबसे संभावित अंत न रूस की पूर्ण विजय है, न यूक्रेन की पूर्ण सैन्य विजय। सबसे संभावित अंतिम परिणति एक कोरियाई शैली के अपूर्ण समझौते या सशस्त्र युद्धविराम की है – एक ऐसी रेखा पर गोलीबारी रुक सकती है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतिम सीमा स्वीकार नहीं होगी।
रूस अपने नियंत्रण वाले कुछ भूभाग पर वास्तविक नियंत्रण बनाए रख सकता है। लेकिन यूक्रेन कानूनी रूप से उसे रूसी क्षेत्र मानने से इनकार करेगा। क्रीमिया का प्रश्न बहुत लंबे समय के लिए टल सकता है।
यूक्रेन को व्यापक पश्चिमी सुरक्षा गारंटी, हथियार, दीर्घकालिक वित्त और यूरोपीय संघ में प्रवेश का रास्ता मिल सकता है, जबकि नाटो की पूर्ण सदस्यता तत्काल समझौते का हिस्सा न बने। कुछ रूसी प्रतिबंध युद्धविराम पालन के साथ धीरे-धीरे ढीले किये जा सकते हैं, जबकि कब्ज़े और युद्ध अपराध से जुड़े प्रतिबंध बने रह सकते हैं।
सामने से देखने पर दोनों इसे विजय बताएंगे – रूस कहेगा उसने भूमि और नाटो की तत्काल सदस्यता रोकी, यूक्रेन कहेगा उसने रूस द्वारा राष्ट्र मिटाने की कोशिश विफल की, स्वतंत्रता बचाई और स्वयं को स्थायी रूप से यूरोप से जोड़ लिया। वास्तविकता में यह दोनों की अपूर्ण जीत और भारी पराजय का मिश्रण होगा।
तीन और संभावित रास्ते, लेकिन कम संभावना वाले
इसके अलावा तीन अन्य परिणाम संभव हैं लेकिन कम संभावित। एक, रूसी सैन्य या आर्थिक संकट इतना गहरा हो कि मॉस्को महत्वपूर्ण क्षेत्र से पीछे हटे – ये असंभव नहीं है लेकिन अभी आसन्न भी नहीं।
दूसरा, पश्चिमी सहायता में बहुत बड़ा पतन हो और यूक्रेन को आज की तुलना में कहीं कठोर क्षेत्रीय समझौता स्वीकार करना पड़े – यह भी संभव है, विशेषकर यदि यूरोप की राजनीतिक एकता टूटती है।
तीसरा, किसी आकस्मिक घटना से युद्ध नाटो और रूस के सीधे संघर्ष में बदल जाए – यह सबसे खतरनाक लेकिन दोनों पक्षों द्वारा जानबूझकर टाला जा रहा परिदृश्य है। परमाणु हथियारों के कारण पूर्ण रूस-नाटो युद्ध लगभग सभी के लिए विनाशकारी होगा, इसलिए आश्चर्यजनक रूप से यही भय बड़े युद्ध को सीमित रखने का सबसे बड़ा कारण भी है।
आखिर किसका दावा कितना सच निकला?
पुतिन सही थे कि रूस और नाटो के बीच सुरक्षा संघर्ष वास्तविक है। लेकिन उनका यह अनुमान गलत निकला कि सैन्य बल से यूक्रेन को आसानी से रूसी सुरक्षा व्यवस्था में वापस लाया जा सकता है। ‘नरसंहार’ का औचित्य प्रमाणित नहीं हुआ, ‘नाज़ीवाद खत्म करने की बात राजनीतिक नारा ही रही, असैन्यीकरण (demilitarization) उलटा हुआ और नाटो रूस से दूर होने के बजाय फिनलैंड तथा स्वीडन के प्रवेश से उसके और निकट आया।
रूस ने फिर भी एक महत्वपूर्ण बात हासिल की – उसने यूक्रेन के बड़े भूभाग पर कब्ज़ा कायम रखा और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद राज्य तथा युद्ध अर्थव्यवस्था को टिकाए रखा। ज़ेलेंस्की भी सही सिद्ध हुए कि यूक्रेन लड़ सकता है, सरकार टिक सकती है और दुनिया का बड़ा हिस्सा उसकी सहायता करेगा। उनका रूस के पूर्ण अंतरराष्ट्रीय अलगाव का शुरुआती दावा अतिरंजित रहा और सभी कब्ज़े वाले भूभाग को शीघ्र मुक्त कराने की आकांक्षा अब तक पूरी नहीं हुई।
पश्चिम भी आधा सही, आधा गलत निकला – रूसी सेना अजेय नहीं थी, लेकिन रूस प्रतिबंधों से ढहा भी नहीं।
इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना क्या है?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस युद्ध में दोनों देशों ने अपने घोषित उद्देश्य का कुछ हिस्सा स्वयं कमजोर किया है। रूस अधिक सुरक्षित सीमा चाहता था, उसे बड़ा और अधिक शस्त्रसज्जित नाटो मिला। वह यूक्रेन को अपने सांस्कृतिक संसार में रखना चाहता था, उसने यूक्रेनी राष्ट्रीय पहचान को अभूतपूर्व रूप से मजबूत किया। वह यूक्रेन को निरस्त्रीकृत करना चाहता था, उसने उसे आधुनिक युद्ध की प्रयोगशाला बना दिया। यूक्रेन अपनी 1991 की पूरी सीमाएँ और सामान्य यूरोपीय विकास चाहता था, उसने स्वतंत्रता तो बचाई लेकिन उसका पाँचवाँ हिस्सा कब्ज़े में है, लाखों नागरिक विदेश में हैं और पुनर्निर्माण का बिल लगभग 588 अरब डॉलर है। पश्चिम जगत रूस को कमजोर करना चाहता था, उसने उसकी सेना को भारी क्षति पहुँचाई और यूरोप को एकजुट किया। लेकिन साथ ही रूस को चीन और उत्तर कोरिया के बहुत अधिक करीब धकेल दिया। वहीं रूस पश्चिमी प्रभाव रोकना चाहता था और उसने यूक्रेन को पश्चिम से पहले से कहीं अधिक गहराई से जोड़ दिया।
अंत में विजेता कौन होगा?
यदि केवल नक्शा देखें तो रूस ने क्षेत्र जीता है। यदि 2022 के शुरुआती रणनीतिक उद्देश्य देखें तो उसने अधिकांश हासिल नहीं किये। यदि राष्ट्रीय अस्तित्व देखें तो यूक्रेन ने असाधारण विजय प्राप्त की – एक विशाल पड़ोसी उसे राज्य के रूप में समाप्त नहीं कर पाया। यदि भूमि, जनसंख्या और अर्थव्यवस्था देखें तो यूक्रेन ने भयावह नुकसान झेला। यदि सैनिकों की संख्या देखें तो रूस ने कई गुना अधिक सैनिक खोये। यदि समाज की स्वतंत्रता देखें तो रूस युद्ध के दौरान और अधिक दमनकारी हुआ, जबकि यूक्रेन भी मार्शल लॉ, केंद्रीकरण और चुनाव स्थगन की कठिन लोकतांत्रिक परीक्षा से गुजर रहा है।
यदि भविष्य देखें तो दोनों ऐसे घाव लेकर निकलेंगे जिन्हें किसी शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने से मिटाया नहीं जा सकेगा। और शायद इस युद्ध का अंतिम इतिहास इसी एक विरोधाभास में लिखा जाएगा कि रूस इतना शक्तिशाली था कि यूक्रेन का बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर सका। लेकिन इतना शक्तिशाली नहीं निकला कि यूक्रेन को अपने अधीन कर सके। यूक्रेन इतना मजबूत निकला कि रूस को विजय से रोक सका। लेकिन इतना मजबूत नहीं कि अकेले उसे अपनी पूरी भूमि से निकाल सके।
इसलिए बंदूकें जिस दिन शांत होंगी, उस दिन कोई स्पष्ट विजेता खड़ा नहीं होगा। पुतिन रूस को बताएंगे कि उन्होंने नाटो को यूक्रेन में आने से रोका और रूसी भूमि बढ़ाई। ज़ेलेंस्की या उनके उत्तराधिकारी यूक्रेन को बताएंगे कि उन्होंने उस राज्य को बचाया जिसे रूस मिटाने निकला था। दोनों कथनों में कुछ सच होगा और दोनों में बहुत कुछ छिपाया जाएगा। वास्तविक परिणाम शायद यह होगा कि एक घायल यूक्रेन यूरोप में पहले से अधिक स्थायी रूप से जुड़ चुका होगा, एक घायल रूस पश्चिम से अधिक दूर और एशिया की ओर अधिक निर्भर हो चुका होगा। यूरोप फिर हथियारबंद हो चुका होगा और क्रीमिया तथा डोनबास का प्रश्न किसी अंतिम समाधान के बजाय आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ दिया गया होगा।
युद्ध का सबसे कठोर निष्कर्ष इसलिए नक्शे पर नहीं, समय में दिखाई देता है। रूस ने यूक्रेन की भूमि ली है। लेकिन यूक्रेन को खो दिया है। यूक्रेन ने अपनी स्वतंत्रता बचाई है। लेकिन उसका मूल्य अपनी आबादी, शहरों और विकास के दशकों से चुकाया है। और दुनिया ने एक बार फिर यह सीखा है कि युद्ध शुरू करना कुछ घंटों का निर्णय हो सकता है। लेकिन उसे समाप्त करना कभी-कभी एक पीढ़ी का काम बन जाता है।
युद्ध का अंत दिखाई देने लगा है ऐसा कहना अभी जल्दबाज़ी होगी, पर यह भी सही नहीं कि कोई रास्ता नहीं है। रास्ता तब खुलेगा जब मॉस्को समझे कि अतिरिक्त भूमि के लिए अतिरिक्त लाखों हताहत और दीर्घकालिक अलगाव लाभ का सौदा नहीं है। और कीव तथा उसके सहयोगी ऐसा सुरक्षा ढाँचा बना सकें जिसमें युद्धविराम आत्मसमर्पण न लगे।
अंतिम समाधान पूर्ण न्याय से कम और पूर्ण विजय से बहुत कम होगा – एक असुविधाजनक युद्धविराम, अनसुलझी सीमा, भारी सुरक्षा गारंटी और दशकों तक चलने वाली शत्रुता। यह संतोषजनक अंत नहीं होगा। लेकिन साढ़े चार वर्ष की इस रक्तरंजित लड़ाई को देखते हुए फिलहाल यही सबसे यथार्थवादी अंत दिखाई देता है।
