Middle East war death toll 2026: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की धरती इस वक्त बारूद के धुएं और बेगुनाहों के खून से सनी हुई है। 28 फरवरी को शुरू हुई अमेरिका-इजरायल की संयुक्त एयर स्ट्राइक के बाद से ईरान और आसपास के इलाकों में जो तबाही मची है, उसने पिछले कई दशकों के काले इतिहास को पीछे छोड़ दिया है। आसमान से बरसते गोलों ने हंसते-खेलते शहरों को कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा रिपोर्ट ने इस युद्ध की जो भयावह तस्वीर पेश की है, वह रूह कंपा देने वाली है। शुरुआती कुछ हफ्तों के भीतर ही 3,300 से ज्यादा लोग मौत की नींद सो चुके हैं, जबकि 43 लाख से ज्यादा लोग अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दर-बदर भटकने को मजबूर हैं।
Middle East war death toll 2026: दशकों की सबसे बड़ी त्रासदी: 30 हजार से ज्यादा घायल
विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय निदेशक हनान बाल्खी ने एक मीडिया ब्रीफिंग में बेहद भारी मन से बताया कि यह संघर्ष हाल के दशकों के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बन चुका है। अब तक 3,300 से अधिक मौतों की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें बच्चों और बुजुर्गों की संख्या डराने वाली है। इसके अलावा 30 हजार से ज्यादा लोग गंभीर रूप से झुलसे और घायल हुए हैं, जिनके इलाज के लिए अस्पतालों में न तो जगह बची है और न ही दवाइयां। बाल्खी के अनुसार, रिफ्यूजी कैंपों में क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग ठूंस-ठूंस कर भरे हुए हैं, जहां भूख और बीमारी का नया खतरा मंडरा रहा है।
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निशाने पर अस्पताल: चरमरा गई स्वास्थ्य व्यवस्था
इस युद्ध की सबसे दर्दनाक बात यह है कि जीवन बचाने वाले स्वास्थ्य केंद्रों को भी नहीं बख्शा गया। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अब तक स्वास्थ्य सुविधाओं पर 116 सीधे हमले किए गए हैं। एम्बुलेंस, आपातकालीन सेवाएं और बुनियादी ढांचे पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं। कई डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अपनी ड्यूटी करते हुए शहीद हो गए हैं। घायलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि सड़कों पर पट्टियां बांधी जा रही हैं। औद्योगिक इकाइयों और बिजली-पानी की सप्लाई लाइनों को निशाना बनाने से आम जनता के पास जीने का कोई सहारा नहीं बचा है।
युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। हनान बाल्खी ने चेतावनी दी है कि वर्तमान हालात पर्यावरण के लिए किसी महाविनाश से कम नहीं हैं। लोग इस वक्त जैविक, परमाणु और रेडियोएक्टिव विकिरण के गंभीर जोखिम के बीच जी रहे हैं। फटे हुए कारखानों और तबाह हुए ठिकानों से निकलने वाला जहर पूरी पीढ़ी को अपाहिज बना सकता है। यह संकट अब केवल ईरान या इजरायल का नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
शांति की गुहार: कब थमेगा यह खूनी खेल?
मिडिल ईस्ट से जो तस्वीरें उभर कर आ रही हैं, वे दिल चीर देने वाली हैं। मलबे के नीचे दबे अपनों को खोजते हाथ और आसमान की तरफ देखकर शांति की भीख मांगती आंखें आज दुनिया से सवाल पूछ रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने सभी पक्षों से तुरंत संघर्ष विराम (सीजफायर) की अपील की है। बाल्खी ने मांग की है कि कम से कम स्वास्थ्य केंद्रों और डॉक्टरों को सुरक्षा की गारंटी दी जाए ताकि घायलों को मरने से बचाया जा सके। लेकिन फिलहाल, बारूद की गंध और मिसाइलों की गड़गड़ाहट के बीच शांति की हर आवाज दबी हुई नजर आ रही है। दुनिया इस वक्त एक ऐसी त्रासदी देख रही है, जिसका जख्म भरने में सदियां लग जाएंगी।
