Taique Rehman: लंबे राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बाद अब आखिरकार बांग्लादेश को नया प्रधानमंत्री मिल गया है। BNP नेता तारिक रहमान ने संसद भवन में पद और गोपनीयता की शपथ ली। उनके साथ लगभग 49 मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण किया, जिनमें 25 कैबिनेट मंत्री और 24 राज्य मंत्री शामिल हैं। लेकिन शपथ समारोह से पहले और बाद में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने बांग्लादेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
Taique Rehman: ‘जुलाई चार्टर’ पर सरकार का कड़ा रुख
चुनाव के साथ ही एक जनमत संग्रह भी आयोजित कराया गया था, जिसे ‘जुलाई चार्टर’ नाम दिया गया। इस चार्टर में प्रस्ताव था कि कोई भी व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा दो कार्यकाल या 10 साल से ज्यादा प्रधानमंत्री नहीं रह सकेगा। (Taique Rehman) साथ ही प्रधानमंत्री की शक्तियां सीमित कर राष्ट्रपति को ज्यादा अधिकार देने की बात भी शामिल थी। जानकारी के मुताबिक, जनमत संग्रह में करीब 62% लोगों ने समर्थन में वोट दिया।
हालांकि, शपथ लेते ही प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने यह साफ़ कर दिया कि मौजूदा संविधान में ऐसे किसी प्रस्तावित परिषद या त्वरित संशोधन का प्रावधान नहीं है। BNP नेताओं का कहना है कि जिस प्रक्रिया से चार्टर तैयार किया गया, उसमें उनकी पार्टी को शामिल नहीं किया गया था। ऐसे में सरकार ने फिलहाल संविधान में व्यापक पाइवर्तन से दूरी बना ली है।
- Advertisement -
जमात-ए-इस्लामी का विरोध और बदलता रुख
शपथ ग्रहण से पहले जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए विरोध मार्च निकाला। (Taique Rehman) पार्टी ने 32 निर्वाचन क्षेत्रों में पुनर्मतगणना की मांग भी उठाई। लेकिन, इन सब में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद पहले नई सरकार को बधाई दी गई थी, लेकिन दो दिन के अंदर रुख पूरी तरह स बदल गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जमात और अन्य सहयोगी दलों के अंदर ‘जुलाई चार्टर’ को लेकर मतभेद उभर आए हैं। जानकारी के मुताबिक, शपथ से एक दिन पहले कुछ नेताओं ने सरकार में जमात के निर्वाचित सदस्यों को शामिल करने का सुझाव भी दिया था, जिसे BNP ने स्वीकार नहीं किया।
मोहम्मद यूनुस की भूमिका पर खड़े हुए गंभीर सवाल
पूर्व अंतरिम व्यवस्था से जुड़े नामों में मोहम्मद यूनुस की भूमिका भी चर्चा में रही। उन्होंने अपने भाषण में क्षेत्रीय सहयोग, ‘सेवन सिस्टर’ राज्यों, नेपाल और भूटान के साथ संभावनाओं की बात की थी। (Taique Rehman) लेकिन नई सरकार के गठन के बाद उनके कुछ करीबी अधिकारियों के विदेश रवाना होने की खबरों ने अटकलों को जन्म दिया है।
BNP के कुछ सांसदों ने आरोप लगाया है कि पिछली व्यवस्था के दौरान लिए गए निर्णयों और वित्तीय लेन-देन की गहनता से जांच होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक माहौल में अविश्वास की भावना साफ नज़र आ रहा है।
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और शेख हसीना की विरासत
देखा जाए तो बांग्लादेश की राजनीति लंबे वक़्त से दो प्रमुख ध्रुवों एक BNP और अवामी लीग के बीच ही घूमती रही है। BNP की नेता रहीं खालिदा जिया और अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना के बीच दशकों तक राजनीतिक संघर्ष चलता रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘माइनस-टू’ जैसी अवधारणाएं, जिनमें दोनों परिवारों को सत्ता से दूर रखने की बात कही जाती रही, व्यवहार में कभी सफल नहीं हो सकीं। (Taique Rehman) अब तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP की वापसी को नई पीढ़ी की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि उनके सामने स्थिरता और संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संकेत
बता दे, शपथ ग्रहण समारोह में कई देशों को आमंत्रित किया गया था। भारत की तरफ से लोकसभा अध्यक्ष के स्तर का प्रतिनिधित्व हुआ, जबकि पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई देशों से अपेक्षाकृत निम्न स्तर के प्रतिनिधि पहुंचे। (Taique Rehman) इसे ‘वेट एंड वॉच’ रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पड़ोसी देशों की निगाहें इस बात पर टिकी है कि नई सरकार क्षेत्रीय संतुलन, सुरक्षा और आर्थिक सुधारों पर क्या रुख अपनाती है।
अब… आगे क्या?
नई सरकार ने यह साफ़ संकेत दे दिया है कि वह त्वरित संवैधानिक परिवर्तन की बजाय स्थिर शासन और प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान देगी। (Taique Rehman) लेकिन विपक्षी दलों और कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता को देखते हुए राजनीतिक तनाव की संभावना बनी हुई है।
बांग्लादेश के लिए यह वक़्त बेहद निर्णायक माना जा रहा है। एक तरफ जहां आर्थिक चुनौतियां, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक ध्रुवीकरण। (Taique Rehman) ऐसे में तारिक रहमान की सरकार के सामने सबसे बड़ी कसौटी होगी – संविधान की स्थिरता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और सभी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
आगामी कुछ सप्ताह में यह साफ हो जाएगा कि क्या यह नई शुरुआत बांग्लादेश को स्थिरता की तरफ ले जाएगी या फिर सियासी टकराव और तेज होगा। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नज़रें ढाका की नई सत्ता पर टिकी हैं।
