Donald Trump: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने आक्रामक बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। दुनिया में अमेरिकी दबदबा बढ़ाने के नाम पर वह लगातार अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों को “कमजोरी” और “बकवास” करार दे रहे हैं। पूर्वी यूरोप में रूस को काबू में रखने के लिए ग्रीनलैंड पर कब्जे की खुली बात करने वाले ट्रंप अब भारत के पड़ोस से जुड़े एक अहम रणनीतिक क्षेत्र पर भी बयान दे चुके हैं।
Donald Trump: दीएगो गार्सिया को लेकर ट्रंप की नाराजगी
हाल ही में ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर ब्रिटेन की उस योजना की कड़ी आलोचना की, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह जिसमें दीएगो गार्सिया शामिल है की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपी जा रही है। (Donald Trump) ट्रंप ने इसे “पूर्ण कमजोरी” और “बड़ी मूर्खता” बताया। उन्होंने कहा कि दीएगो गार्सिया जैसे महत्वपूर्ण द्वीप को सौंपने से चीन और रूस जैसी ताकतों को गलत संदेश जाएगा।
ग्रीनलैंड विवाद से जोड़ा मामला
ट्रंप ने इस मुद्दे को ग्रीनलैंड हासिल करने की अपनी मांग से भी जोड़ा। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताकत दिखाना जरूरी है और ऐसे समझौते अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करते हैं। (Donald Trump) उन्होंने दावा किया कि उनकी अगुवाई में अमेरिका पहले से ज्यादा सम्मानित और मजबूत हुआ है।
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चागोस-दीएगो गार्सिया की पृष्ठभूमि
दीएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है, जहां 1960 के दशक से अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा मौजूद है। 1965 में ब्रिटेन ने इसे मॉरीशस से अलग कर ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी बनाया था, जिसके बाद हजारों मूल निवासियों को विस्थापित किया गया। (Donald Trump) मई 2025 में यूके और मॉरीशस के बीच हुए समझौते के तहत चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को दी गई, जबकि दीएगो गार्सिया पर 99 साल की लीज ब्रिटेन के पास रहेगी।
हालांकि ट्रंप ने भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत इस समझौते का समर्थन कर रहा है और मॉरीशस को क्षेत्रीय प्रबंधन में सहयोग दे रहा है। भारत ने चागोस क्षेत्र में समुद्री संरक्षण, सैटेलाइट स्टेशन और सर्वे के लिए आर्थिक मदद भी दी है। हिंद महासागर में बढ़ते सैन्य प्रभाव को लेकर भारत सतर्क रहा है।
बदलते रुख से बढ़ी अनिश्चितता
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप प्रशासन पहले इस समझौते का समर्थन कर चुका था, लेकिन अब ट्रंप के यू-टर्न से अनिश्चितता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयानों से न सिर्फ ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता प्रभावित हो सकता है, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
